नव - निधि | Nav Nidhi

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Nav Nidhi by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्2 नवनांधि ८ न राजा उठ पेठे और कुछ नर्म स्वरसे बोले-नहीं, हरदौल लड़का नहीं है, लड़का में हूँ जिसने तुम्हार ऊपर विश्वास किया | कुलीना, मुके तुमसे ऐशी श्राद्या न थी । मुझे तुम्हारे ऊपर घमंड था । मैं समकता था, चौद-सूय टल सकते हैं, पर तुम्हारा दिल नहीं टल सकता | पर आज मुझे मालूम हुआ कि यह मेरा लड़कपन था । बड़ोंने सच कहा है कि; ख्रीका प्रेम पानीकी धार है; जिस श्रोर ढाल पाता है, उधर ही वह जाता है। सोना ज्यादा गर्म होकर पिघल जाता है | कुलीना रोने लगी । क्रोघकी ब्याग पानी बनकर अंँखोंसे निकल पड़ी ! जब आवाज बदमें हुई, तो बोली--में आपके इस सन्देहकों केसे दूर करूँ: ! राजा--हरदोलके खूनसे । रानी--मेरे खूनसे दाग न मिटेगा ? राजा--तुग्हारे खूनसे और पक्का हो जायगा | रानी--थर कोई उपाय नहीं है ? राजा--नहीं । रानी--यह आपका अन्तिम विचार है १ राजा--हाँ; यह मेरा अन्तिम विचार है । देखो, इस पान-दानमें पानका वीड़ा रक्खा है । तुम्हारे स्तीत्वकी परीक्षा यही है 1फ तुम हरदौलकों इसे श्रपने हाथसे खिला दो । मेरे मनका श्रम उसी समय निकलेगा जव इस घरसे हरदौलकी लाश निकलेगी | नौीन घूखाकी इष्टिस पानके बीड़ेकों देखा और वह उलटे पैर लोट आई ) रानी सोचने लगी--क्या हरदौलके प्राण लेँ ? निर्दोष, सचरित्र वीर हरदौलको जानसे श्रपने सतीत्वकी परीक्षा दू £ उस हरदोलके




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