साहित्यिक लेख | Sahityik Lekh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ६. 3लाते रददने से उनमें निदिष्ट समय में, निश्चित नियमानुसार, मर्यादा- पूर्ण ढंग से काम करने शऔर कराने का प्रेम उत्पन्न हो गया था । इसी- लिए उनमें श्यनुशासन प्रेम और मयीदा का विचार विशेष रूप से बढ़ा था । स्पटवादिता के साथ मिलकर यददी ऋनुशासन-प्रियता उनको भयप्रद बनाये रहती थी, उनकी श्रव्यक्तता में पढ़ने-लिखने वाले वियार्थों और उनके संरक्तण में कार्य करने वाले उनके सहायक उनसे सशंक एवं सजग रहा करते थे । चरित्र की ये सभी विशेषताएं प्राय: बुद्धि प्रधानता की सूचक हैं। वायू साहब के संपूर्ण जीवन की यदि विधिवत मीमांसा को जाय तो इतना झवश्य स्पष्ट होगा कि उनमें जितनी चुद्धि की श्रवलता थी उतनो भावुकता-परक सहदयता की नहीं । थोड़े में कहा जा सकता हैं कि उनका जीवन ऊर्थ्वगामी बुद्धि का वेभवपूर्ण प्रदर्श था ।डाक्टर श्यामसुन्दरदास का व्यक्तित्व कृतित्व के कारण श्यादरणी य, श्नुभव के कारण गांभीयपूर्ण श्औौर सादित्यिक साधना के कारण भव्य था । उनकी चातचीत में सफाई, र न-सहन में सफाई, जीवन श्र, चरित्र में सफाई--सभी ओर से शुद्धता तथा सुस्पष्टता का '्याभास मिलता था | हिंदी साहित्य के सर्जन श्र संवद्धन करनेवालों की श्रेणी में बाबू सादव का व्यक्तित्व चेजोड़ था ।




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