मनोज मंजरी | Manoj Manjari

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Manoj Manjari by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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के के लननसकसलियनिससरपरयसपमनयमरमनथिरिदियनथसमिनक भ कर ऊकांह भरो मानो रूप सागर को '.ठाढ़ी धाइ लेत है ॥- 98७ 1॥ नमन की उपमां आो आनन को चाहै. तंऊं आन न मिलेगी चतुरानन बिचारे की । कुसस कमान के कमान को गुमान गयो करि अनुमान भौंह रुप श्रति प्यारि को ॥ गिरंघर- दास दोऊ देखि नेन वारिलात बारिज्ञात बो- रिज्ञात सान सर वार को । राधिका को रूप देखि रति को लजात रूप जात रूप जातरूप जातसरूंप वार को ॥ ३८ ॥ गोरी के इृघोरी शिव कबि मेहँदी के बिंदु इन्द तो को गण नाके आगे लगे फौको डे । गुठा.अनप छाप मानो ससि आयो आप कर कंज के सिलाप पात तजि हौको है ॥ आगे और आंगुरो 'अँगूठी नोलमनि जुत बेठो मनो चाय भरो चिठुआ अलो को है ।.. दबि के. छला सों |. कोमलाई सों. ललाई.दौरि. जौतत , चुनी को.. चँग- छोर छिसुनी को है ॥- ८ .॥ : : वि कि किसे चैतडैए सदस सलाइ के सलाइ सों वि कक




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