भारत की चित्रकला | Bhart Ki Chitrakala Ac.2745

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Bhart Ki Chitrakala Ac.2745 by राय कृष्णदास - Rai Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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झस्तर-बड्डी--सं० ( झस्तर+ बट्टी ) श्रस्तर, वदद मसाला जिससे जमीन बाँधी जाय; बट्टी, उस जमीन के धघोंट कर बराबर करने के लिये चिकने पत्थर को बड़ी | अदम-कद--वि० श्रादमी की ऊँचाई के बराबर केई चित्र वा मूर्ति | झालेखन--सं० चित्रविन्याठ, छिखाई । क्रि० चित्र झंकित करना | उरेहना--क्रि० चित्र अंकित करना | कलम--सं० गिलहरी की पूँछ के राएँ से बना आलेखन का उपकरण ( ्रश ); श्रालेखन-शैली । कुनियाँ, कानियाँ--सं० किसी चतुध्केण कृति में चारों केने का अलंकरण | गेमूज्िका--सं० इस आकृति की---बेल । वबैल जब चलता रहता दे तो उसके मूत्र का चिह्न उक्त आकार का पढ़ता है | बैल-मूृतनी; बरद-मुतान । खेहरइ--सं० चेहरे की रंगत । ज्षमीन--सं० चित्र लिखने के लिये अस्तर को हुई उपयुक्त सतह । क्रि० जमीन बाँधना, श्रस्तर लगाकर जमीन तैयार करना । कलक -सं० वह प्रधान रंगत (-श्राभा) जा समूचे चित्र में व्याप्त है । टपरना--क्रि० पत्थर के टॉकी को चेट से खुरदरा बनाना | तरह--सं० रचना-प्रकार, ालंकारिक अंकन (डिज़ाइन) । दम-खम--सं० जानदार--बिना दूटवाली, एवं गोलाई लिए-- बंकिम ( मूर्ति की गढ़न वा चित्र की रेखाएं ) ।




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