घनानन्द और बोधा के काव्य में रूप सौन्दर्य एवं प्रेम : एक तुलनात्मक दृष्टि | Ghananand Aur Bodha Ke Kavya Mein Roop Saundarya Avam Prem Ek Tulnatmak Drishti

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उनकी भक्ति परक रचनाओं में उज्जूवल रूप में दृष्टिगोचर होता है। संसार में सच्चा सनेही दुर्तभ है, यदि सच्चा सनेही मिल भी जाये तो उसका जीवन भीषण संकटों से आपन्न हुआ करता है, यह प्रेम का मार्ग सीधा तो अवश्य है, उसमें चातुर्थय॑ का लेश भी अपेक्षित नहीं, प्रेम में वासना का तिरोभाव हो चुका रहता है और निष्ठा या अनन्यता आ चुकी रहती है, इसमें सर्वात्म भाव से आत्म-समपर्ण करना पड़ता है, इसी कारण प्रेम का पंथ कराल है, ऐसा घनानंद-बोधा मानते हैं। इस लोक में जितना भी प्रेम गोचर हो रहा है ,. उस अनन्त प्रेम के कनूके का प्रसार है, तभी तो इसका इतना महत्व है ,. प्रेम अपने आप में एक शुद्ध और निर्मल यृत्ति है, इस वृत्ति का धारण कर्त्ता होने पर वासनायें विलुप्त हो जाती हैं, अंत:करण से आनन्द रस की ऐसी यृष्टि होती है कि प्रेमी सकाम होते हुए भी निष्काम हो जाता है।. इसी कारण घनानंद ने लौकिक प्रेम को अलौकिक प्रेम से सम्बद्ध कर लिया। घनानंद और बोधा के रोम-रोम में अपनी प्रेयसियों का प्रेम बसा हुआ था, उन्होंने प्रेम के उद्भव के बाद जो भी लिखा प्रेमी कवि होने के नाते लिखा, उनका समस्त काव्य सुजान-सुभान की. कहानी कहता है।. कहीं गौर वर्ण की चना, कहीं तिरछी चितवन की, कहीं कजरारी आँखों को।. बोधा ने कथा के माध्यम : से लीलावती-कामकंदला के प्रति नायक माधव के प्रेम की विशद्‌ व्याख्या की है। रीतिमुक्त कवि प्रेम के मार्ग को कठिन बताते हुए, प्रेम महत्त्व को स्वीकार करते हैं तभी तो उन्होंने प्रेम का खुला वर्णन प्रस्तुत किया।* वे प्रेम को गुप्त भी रखना चाहते थे इसी कारण वियोग को स्थिति में दुःख “को स्वयं ही सहन करने की सामर्थ्य भी रखते हैं, वियोग दाह बताकर वे उपहासित नहीं नहीं होना चाहते थे, इस कारण सादगी से प्रेम की. निश्छलता अभिव्यक्त करते हैं।




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