भक्त - बालक | Bhakt - Balak

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Bhakt - Balak by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चन्द्रदास श्ण पूजनकी कुलरीति है; अतएव तुम आज ही सन्ध्याको वहीँ .जाकर भवानीके भेंट चढ़ा आना | थसुरकी आज्ञासे सरढ्हृदय चन्द्रहास सामग्री लेकर भवानीकि स्थानकी ओर चला । मनुष्य मन-ही-मन कितनी हीं कुटिल कामना करता हुआ नानाप्रकारसे शेखचिछ्लीकी तरह महर बनाता है, पर 'करी गोपालका सब होय |' कुन्तलपुर-नरेशके मनेमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, उन्होंने आज ही राज्य त्यागकर परमात्मपद-प्राप्तिका साधन करनेके ढिये बन जानेका निश्चय कर लिया, परन्तु जानेसे पूब राजकुमारीका विवाह करना और किसीको राज्यका उत्तराधिकारी बनाना, ये दो आवश्यक कार्य करने थे ! राजाने पूर्वनिश्वयके अनुसार मन्त्रीपुत्र मदनको बुढाकर कहा-'बेटा ! मेरी आज ही वन जानेकी इच्छा है; चम्पकमाठिनीका हाथ किसी योग्य राजपूत-बाठककों सॉपना 'चाहता हूँ, राज्यका उत्तराधिकार भी 'देना है । हम छोगोंदे. सौमाग्यसे भगवानने कृपाकर चन्द्रहासको यहाँ भेज दिया है। चद्द सब तरदसे योग्य है, तुम अभी जाकर चन्द्रददासको यहीं मेज दो !' राजारकी वात सुनकर सरछ-इृदय मदनके हर्षका पार न रहा, वद्द दौड़ा वहनोईंकों घुढाने । प्रिताकी दुरभिसन्धिका उसे




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