स्मृतियों में मानवाधिकार की अवधारणा | Smritiyon Men Manavadhikar Ki Awadharana

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Smritiyon Men Manavadhikar Ki Awadharana by शुभा सिंह - Shubha Singh

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about शुभा सिंह - Shubha Singh

Add Infomation AboutShubha Singh

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
है , सैद्धान्तिक रूप से. वह अवैधानिक है। कानून यदि विवेक के मार्ग से विचलित होता हे तो वह कानून नहीं हिंसा है । कानून की वैधता प्रकृति के शाश्वत सिद्धान्त से सम्बद्ध है | मानव अधिकारों का विचार जिस तर्क पर आधारित है उस तर्क के आधार पर प्रारम्भ में प्राकृतिक अधिकारों की संकल्पना प्रस्तुत की गई । टॉमस पेन ने प्राकृतिक अधिकारों को ही “” मनुष्य के अधिकार ” की संज्ञा दी |” ये अधिकार इस तर्क पर आधारित थे कि ये मनुष्य की प्रकृति में ही निहित है । ये रीति-रिवाज , कानून राज्य या अन्य किसी संस्था की देन नहीं है । प्राकृतिक आधारों के सिद्धान्त के आरंभिक संकेत बारहवीं शताब्दी के यूरोप में मिलते हैं किन्तु इनका व्यवस्थित निरूपण सत्रहवीं. शताब्दी में आरम्भ हुआ। इस शताब्दी के प्रारम्भ में हयूगो ग्रोशियश ने तर्क दिया कि प्राकृतिक कानून का आधार मानव की विवकेशील प्रकृति में ढूढ़ना चाहिये । इसी तक _ के आधार पर उसने अन्तर्राष्ट्रीय कानून की नींव रखी | प्राकृतिक आधिकारों के विचार को तर्कसंगत रूप में ढ़ालने का श्रेय जान लॉक को है। लॉक ने तक॑ दिया है कि ” जीवन , स्वतंत्रता और सम्पत्ति का अधिकार मानव. की विवेकशील प्रकृति का अभिन्‍न अंग है । यह व्यक्ति के व्यक्तित्व में ही निहित है , इसे उससे अलग नहीं किया जा सकता , इसी अधिकार की रक्षा के लिये राज्य एवं. राजनीतिक संस्थाओं का निर्माण किया जाता है। अतः जब मनुष्य प्राकृतिक दशां से नागरिक समाज में प्रवेश करते हैं , तब वे अपने कुछ ही प्राकृतिक अधिकारों का त्याग है करते हैं | त्याग वे इस शर्त पर करते हैं कि राज्य उनके मूल प्राकृतिक अधिकारों - . जीवन स्वतंत्रता और सम्पत्ति की रक्षा करेगा।' इस प्रकार राज्य की स्थापना एक धरोहर या न्यास के रूप में की जाती है । यह न्यास अपने कर्तव्य में बंधा होता है। यदि वह राज्य अपने कर्तव्य की पूर्ति में विफल हो जाय तो मनुष्य उसे हटाकर नया. राज्य (सरकार) स्थापित कर सकतें हैं | इस तहर लॉक ने प्राकृतिक अधिकारों को परम कप * वहीं पृ 254 10 ओम प्रकाश गावा , राजनीति -सिद्धान्त की रूपरेखा, नोएडा , 2002 पृ0 3834... वही , उद्धत., पू० 335




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now