श्रावकाचार संग्रह भाग 2 | Sravkachar Sangrah Bhag 2

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Sravkachar Sangrah Bhag 2 by पं. हीरालाल जैन सिद्धान्त शास्त्री - Pt. Hiralal Jain Siddhant Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१८ )सप्त व्यसन त्यागके अत्तिचारोंका वर्णन ११९, स्वपत्नीको धर्मंमें व्युत्यात करनेका उपदेश “११९ कुलीन स्त्रियोंको पतिके मनोनुकूल होकर चलनेका उपदेश ***..... १२० स्वपत्नीमें पुत्रोत्पत्तिका प्रयत्न करनेका निर्देश “१२० सत्पुत्नोत्पत्तिके चिना गुहस्थ १२० तृतीय अधिकार १२१-१३० ब्रतिक प्रतिमाका स्वरूप और दाल्योंकि परित्यागका उपदेश १२१ श्रावकके १२ ब्रतोंके नाम निर्देश कर अहिसाणुब्रतका विवेचन “१२१ जिनालय बनवाने और तींथंयात्रादि करने रूप पुष्य राशिमें गमनागमनादि जनित दोषांश पाप नहीं कहलाता “१२२ अह्साणुब्रतके अतिचार “१२२ अहिसाणुब्रतकी रक्षाके लिए रात्रि-भोजन त्याग आवश्यक है १२३ रात्रि-भोजनके दोषोंका वर्णन ५२३ देव पूर्वाह्नमें, ऋषि मध्याह्नमें, दानव सायं और राक्षस रात्रिमें खाते हैं स'. ुएस राश्रिमोजनत्यागी अपने जीवनका अध॑भाग उपवाससे बिताता है “१२५ जल छानकर ही स्नान, पानादि करनेका उपदेश पक १२५ भोजनके अन्तरायोंका वर्णन “१२५ भोजनादिके समय मौन घारण करनेके लाभका वर्णन कर शरण सत्याणुब्रतका वर्णन “१२६ धर्मात्मा और जेनशासनके उद्घाराथ तथा जीव-रक्षाथं सत्य वचनका अपवाद ”**.... १२६ सत्याणुब्रतके अतिचार “१२६ मचोर्याणुब्रतका विस्तृत वर्णन “१२७ अचौर्याणुब्रतके अतिचार “१२७ ब्रह्मचर्याणुब्रतका स्वरूप १२७ ब्रह्मचर्याणुब्रतके अतिचार “१२८ परिग्रहर्पारमाणाणुब्रतका विस्तृत वर्णन १२८ परिग्रह परिमाणव्रतके अतिचार “१२९, देवायुके सिवाय अन्य आयुको बांधनेवाला मनुष्य अणुब्रत या महाब्रत धारण नहीं कर सकता “१२९, नि्मल पाँच भणुब्रतोंका घारक जीव देवगत्ति प्राप्त करता है. “१३० चतुर्थ अध्याय श३१-१४३ गुणब्रतका स्वरूप “१३१ दिग्व्तका स्वरूप और उसकी महत्ता . हैरेश अनथंदण्डब्रतका विस्तृत स्वरूप «१३१ अनथंदण्डब्रतके भतिचार “१३२भोगोपभोगन्नरतका विस्तृत वर्णन ” . हरेरे




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