दानसागर | Daansagar

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Daansagar by भबतोष भट्टाचार्य - Bhabatosh Bhattacharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नर ठ० छा भ स2 रे लिनन्दोफ्दानावत: 2बराद्वपुराण (2100050 016 &2पाट 85 २० जा रख-सडेक) 1 'दीपन्रदानेन जय तिं लभन्ते खुलेन तेजः खुक्कमारताश” । 'प्राणद्यू तिं” ल्िर्थत्ताघापि तेले-“ब्रंशेनामारसलूतसाश्न ॥<॥मन्दिपुराशे +-- याम्य॑ तमोमयं घोर॑ “घन हुग' महदामयम्‌ ।'त्रजन्ति ते च सुखिनो ये केचिहीपदायिनः ॥१०॥ अथ दीोपदानपरिभाषा । महदाभारते :-- इविषा प्रथम: कल्पो द्वितीयश्रौषधघी >( । वसामेदो इस्थि-' नियोसैन कार्य पुष्टिमिच्छता* ॥११॥ विष्रुधरमेत्तिरे :-- घ्ृतेन दीपा दातव्या तेलेवां यदुनन्दन । वसामजादिमिदेंथा न तु दीपा: कथश्वन ॥१२॥। *दत्त्वा दीप॑ न कतंव्यं तेन कर्म विजानता । निर्वापणश्र दीपस्य हिंसनश्व विगहितम्‌ू ॥१३॥। यः कुर्यात्तानि”” कमाशि स्यादसौ पुष्पितैक्षणः । दीपहत्ता भवेदन्घः काणों निवापको '' भवेत्‌ । दोपस्य दानात्‌ पर' दानं न भूतं न भविष्यति ॥१४॥। अथ दानम्‌ । याज्ञवर्क्यः (१1२१०) :-- भूदो पाश्चान्न' “-वख्ाम्भस्तिलसपिं:प्रतिश्रयान्‌ । नेवेशिकसस ण-[घुयोन दत्त्वा खर्गो ]'* महीयते ॥१४॥व, 0, दोपप्रदाने दुप्रगति सभते 8 1. 0, ० भिच्छत1. 0, स्वगमावभाआऋ 9 1.02.0. खिर्धततसभ 10 1, 0, कुय्याीतल, # कुर्ष्यासनपं, 0, ०इरेण० 11 1. 0, नि्दोंयक्षो'& कलदुण 407 बन दुर्ग 12 पा. 0, नआान्न० कि1, 0. ब्रजरते तेन 13 4. 0, चूपान्‌ ्लगचेलो 107 ६306& मजादय 101 निरयासर ए18०१४९०६९० फणपंडणा




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