मैंने कहा | Maine Kaha

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Maine Kaha by लक्ष्मीकांत झा - Lakshmikant Jha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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खोयी 'चीज कीं खोज छ यह सुनकर सेरे मन में जो प्रसन्नता हुई उसके लिये मैं कुछ रुपये भी खर्च करने को तैयार सा होगया । आप जब किसी नये शहर में जाते हैं तो झाप अपने साथ एक “गाइड” ले सकते हैं झाथवा गलियों में भटफते ब्रुए राष्ट्र भूले 'बक्कर काट सकते हैं । मुझे यो चक्कर काना दी पसन्द है । यह सुनकर मेरे कुछ मित्र चक्कर में पढ़ जायेंगे पर लाचारी दै। इसमें आपको जरा परिश्रम पढ़ेगा, पर दिन मर अपने लेरे के दस ही कदम आएे से बीखों बार निकल जाने के बाद सहसा अपने निवासस्थान पर पहुँचने में बया आनन्द होता है, इसे सब नहीं जानते । दूसरा लाम यह है कि कुछ सदकने से आपको शहर भी देखने को मिल जाता है । मैंने झाकसर देखा है कि किसी खौंयी हुई चीज को हूँदते ढूँढले कोई कोई बहुत पहने की खोथी हुई 'चीज भी मिल जाती है । उस समय मेरे मे में जितना ानन्द होता है उतना 'याशन्द जब्त किताय की तलाशी लेते सोते तमंचा--्वादे' बह भकली ही क्यों न दोनपामे पर पुलिसवालों को भी ने होता होगा । इस आनन्द का 'अलुभव सब नहीं कर सकते । खासकर जिनके यहाँ सभी काम सिल- सिले से होता है, को अपने घर की सभी चीजों पर जेल के कैदियों की तर नम्बर देकर रखते हैं, उनके लिये तो यह चानन्द पाना असस्शव ही है ।




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