परमानन्द सागर | Paramanand Sagar

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डॉ गोवर्धननाथ शुक्ल - Dr Govardhannath Sukl

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हरवंशलाल शर्मा - Harvanshlal Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हद. हैं। राधाकृष्ण प्रकृति शरीर पुष्ष हैँ । इन में घाश्याश्रयी भाव है। सहजिया सम्प्रदाय एक तान्त्रिक सागे कहां जा सकता है परन्तु झुद्ध तास्त्रिक मत से साधना पक्ष में इसकी पर्याप्त भिन्नता है । . मध्वाचार्य के सम्प्रदाय का बंगाल पर बड़ा प्रभाव पड़ा था जिसके फलस्वरूप बंगाल में गौडीय देष्णव सम्प्रदाय की परम्परा चली ! गौडीय चैष्णाव सम्प्रदाय में सख्य, दास्य तथा चात्सल्य भावों को भी उपासना में उपादेय माना हैं किन्तु सहजिया बेष्णव केवल माधुयें भाव की छपासना को ही अंण्ठ समभसे हैं । गौडीव बैष्णवों में लो परकीया सस्व को सिद्धास्त रूप से टी स्वीकार किया था पर सहुजिया दँप्णवों ने इस सस्व को व्यावहारिक रुप भी दिया । वास्तव में सहजिया दंष्सवों के सिद्धान्त बौद्ध सहजयान के सिद्धान्तों से बहुत मिलते जुनते हैं । चण्डीदास की उपास्य चाशुली देवी वख्ययानियों की बच्चधात्वीश्वरी का ही दूसरा रूप है । सहजिया सम्प्रदाय के भ्रतिरिक्त बंगाल में झाउल, बाउल, साई, दरवेश आईि श्न्य कई सम्प्रदायों का भी प्रचार था । बाउल सो सहजिया कणों से नी एक कदम श्ौर श्ाये थे । सहुजिया लोगों का प्रेम राधा और कृप्सा दो व्यक्तियों की अपेक्षा रखता है जबकि बाउलों का प्रेम 'मनेमनुस” के प्रति होता है । उनका कहना हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक अलौकिक प्रेमपान है । उसे उसी के प्रति प्रेम करना चाहिये । जैसाकि पहले कहा जा चुका है बंगाल की गौड़ीय शाखा शाध्य सम्प्रदाय की ही एक शाखा कहीं जा सकती है पर इसका व्यावहारिक पक्ष साध्व सम्प्रदाय से भिन्न है । चेतम्य महाप्रमनु के आाविभावि को भत्तिक्षेत्र में एके चमत्कार समता चाहिये । इस भक्ति-प्रान्दोलन के युग में उत्तर मारत के दँप्एएवाचार्यो में चेतन्य महाप्रप्ठु का साम श्ग्रगण्य है । यह एक विचित्र घटना है कि चेतन्य सहाप्रश्नु की कमेमुमि बंगाल ही रही पर उनके सम्प्रदाय का ब्रजसुसि से विशेष सम्बस्ध रहा । चास्तव में चेतस्यमत का शास्थीम विवेचन ब्जसूमि में ही कुंमा । माध्व सत के अनुशाधियों में साधवेन्द्रपुरी, गौडोय सम्प्रदाय श्ौर माध्व सम्प्रदाय के बीच में सेतु का कार्यो करने वाले हैं चेनन्य महाप्रमु । इन्हीं के यह दिंप्य ईद्वरपुरी के गिप्य थे, यदि दीक्षा उन्होंने देदाव भारती से ली थी । भक्ति के प्रसार शरीर प्रचार में चेतन्य सहापभु ने बड़ा योगदान दिया । इन्होंने भारतवर्ष के सभी विख्यात तीर्थ स्थानों की यात्रा की । बक्षिश के तीर्थों के दर्शन से इनकी अ्वृत्ति बृन्दावन के उद्धार की शोर झुकी । बेप्णव धर्म के प्रचार में इन्हें नित्यानन्द जैसे सहयोगी मिले श्रौर दोनों से मिलकर समस्त उतरी भारत को विशेषकर बंगाल को भक्ति सोते से श्ाप्लाबित कर दिया । श्जे, विशेषकर चुस्दावन, के उद्धार का श्रेय बहुत कुछ सत्तस्य महाप्रमु को है । यह विषय यद्यपि अभी तक विवाद का बना हुआ है फिर भी बुन्दावन के उद्धार में चेतस्थ सहायथु का जो योगदान है वह कम महत्व का नहीं है। माधवेनयुरी उनसे एदले बुत्दावन में गोपाल की सूरति स्थापित कर खुके थे, चैतन्य महापभु ने बुत्दावन के उद्धार के लिये श्रपने दो प्रधान शिष्यों को भेजा । थे दो भक्त थे लोकनाथ गोस्वामी श्र सूगर्भाचाय 1 चैतन्य के सहथोगियों में अद् ताचार्य का नाम मीं उल्लेखनीय है, चेतन्यमत को शास्त्रीय रूप देने का धय चंतन्य के क्षिष्य पढु गोस्वामियों को है जिसके नाम हैं: रूप, सनातन, रघुनाथदास, रघुवाथ भट्ट, गोपाल भट्ट भर लोव गोस्वामी 1 माध्व मत की झाला होते पर भी चेतन्यमत का दार्शनिक हृष्टिकोश स्वतन्त है । माध्व सस्प्रदाय का सूलाधार हंतवाद है जबकि चेतन्य का श्रचिन्त्वमेदाभेद । अर्थात्‌ असवावू




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