हिंदी और वैष्णव के मराठी साहित्य | Hindi Aur Vaishnav Ke Marathi Sahitya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तुलनात्मक अध्ययन भरदेश की किसी आयंपूर्व जाति की प्रेमदेवी रही होंगी । वाद में आर्यों में इनकी प्रधानता हो गई और धीरे-धीरे बालकृष्ण के-कृष्ण-वासुदेव एकीकरण के परचात्‌ उसका श्रीकृष्ण के साथ सम्बस्ध जोड़ दिया गया होगा । दसवीं दताब्दी से जयदेव के भर्थात्‌ १२ वीं दाताब्दी तक राधा की प्रतिष्ठा परमाशक्ति के रूप में हो चुकी थी । इसी से अनुमान किया जा सकता है कि राधा बहुत पुराने काल में प्रतिष्टित हुई होंगी । . चौदहंवीं शताब्दी के अन्त में भागवत सम्प्रदाय अपने नये रूप में सामने आया एवम विकसित हुआ । उस समय तक राधा और कृष्ण इतिहास के व्यक्ति नहीं थे वरदु वे सम्पूणा भावजगत की चीज हो. गये थे । राधाकृष्ण से सम्बन्धित भक्ति-सम्प्रदायों पर हम आगे चलकर विवेचन करेंगे । सोलहवीं दताब्दी तक आते आते विभिन्‍न भक्ति-सम्प्रदायों को उपासना-तत्वों के फलस्वरूप श्रीकृष्ण-प्रेम, वात्सल्य, दास्य, सख्य आदि विविध भावों के मधुर आलंबन-स्वरूप पूर्ण -ब्रह्म-शीकृष्ण बन गए । राधाकृष्ण की युगल मूर्ति के स्वरूप का पूर्ण विकास समभने के लिये हमें तंत्रवाद और सहजवाद को समभना आवद्यक होगा । इसका विवेचन हम अपने प्रबन्ध के अगले अध्यायों में यथास्थान करेंगे । ब्रजभाषा -काव्य के आरम्भकाल में राघा-कृप्ण, इतिहास या तत्ववाद को चीज नहीं रह गए थे । वे सम्पूणं भाव जगतु की चीज हो गए थे । भक्ति प्रेम और माधुयं की नाना सम्प्रदायों से विचित्र यह युगलमुर्ति ईश्वर का रूप तो थी पर उसमें वेदिक देवताओं का संभ्रम नहीं था । वह एकदम सीधा ठेठ-घरेलू सम्बन्ध था । तंत्रवाद के प्रभाव से ससीम रससे असीम की उपलब्धि के सिद्धांत ने तुरन्त ही तदुयुगीन समाज को सखा, प्रिय, और स्वामी रूप से कृष्ण की उपासना के प्रति सचेष्टअग्रसर कर दिया था । वे यथाथ में ही हमारे सहज-स्वाभाविक भावों के आलम्बन बन गए थे । *महाभारतड के सभा पव॑ के ६८ वें अध्याय में द्रौपदी ने चीरहरणा के प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण को “गोविन्द . द्वारकावासिन कृष्ण गोपीजन प्रिय: ।' नाम से पुकारा है । कुछ लोग इसे प्रक्षिप्त मानते हैं । पर इस प्रक्षि्तता का. कोई प्रामारणिक आधार नहीं है । हरिवंग जिसे २री या देरी दाताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है, उसमें हालीसक-क्रीड़ा का. उल्लेख है, वह भागवत की रासलीला का ही पूर्व रूप है। भागवत की रासलीला श्रीकृष्ण जीवन की एक वहुत महत्वपूर्ण घटना है ।१. सुरसा हित्य--डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्र० ३११॥ २. सुरसाहित्य--डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्र० ३१३ दे. महाभारत,-सभापरव, अध्याय ६८ ।




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