जैनाचार्य रविषेण कृत 'पद्मपुराण' और तुलसी कृत 'रामचरितमानस' | Jainacharya Ravishen Krit Padmapuran Aur Tulasi Krit Ramcharitmanas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पन्द्रह् प्रस्तुत ग्रन्य के पाठक, निरसन्देहू, एम. ए. या पी-एच. ढी. स्तर के आस- पास के होगे । ऐसे सुधी पाठकों के लिए सस्कृत उद्धरणों का हिन्दी अनुवाद देना मैंने अनावश्यक समभका है। इसी प्रकार काव्याद्धो के उदाहरण देते समय काव्याद्धो का विवेचनात्मक परिचय नही दिया इसी विदवास के कारण कि कम- से-कम ये विद्वान्‌ पाठक सम्बद्ध काव्याज्ध की परिभाषा से तो परिचित होगे ही । जिस उत्खात सामग्री का मैंने प्रस्तुतीकरण किया हैं, उसमें नायद भावी गोघ को भी कुछ दिशाएँ मिल सके । उदाहरण के लिए--'रविपेण की उपसा' “रविपेण के रूपक', “रविपेण की उ्प्ेंक्षाएँ' तथा “रविपेण के वर्णन” आदि स्वतन्त्र श्ोघ के चिपय प्रस्तुत ग्रन्थ से अवष्य कुछ-न-कुछ सहायता पा सकते है। रामचरितमानस के 'दसानन', “सुर्पनखा' आदि गव्दों को विवेचन के समय 'दलानन', “यूर्पनखा' आदि लिख दिया गया है । प्रस्तुत घोव-प्रवन्ध अग्रजकल्प डॉ० ओमप्रकाश जी दीक्षित एम. ए (हिन्दी- सस्कूत पी-एच डी , शास्त्री (रीडर तथा अध्यक्ष हिन्दी-विभाग, जे वी. जैन कालेज, सहारनपुर) के निर्देशन मे सम्पन्न हुमा था । डॉ० दीक्षित ने जैन-साहित्य- सम्बन्धी छोघ को एक नवीन दिद्या दी है । जैन-रामकाव्य और कृप्णकाव्य का जैनेतर (ब्राह्मण या वैष्णव) रामकाव्य और कृष्णकाव्य के साथ तुलनात्मक अध्ययन करना और कराना डॉ० दीक्षित के शोघ-जीवन का वहुमूल्य प्रसग है । स्वयंभू के 'पउमचरिउ' और तुलसी के 'मानस' पर उन्होंने स्वत: कार्ये किया था और रविषेण के 'पद्मचरित' पर मुभके कार्य करने की प्रेरणा दी । उनके कार्य के वाद तो अनेक विद्वविद्यालयो मे *पउसचरिय', 'पर्मच रित' और “पउसचरिउ' के पात्रों, कथानक तथा अन्य पहलुओ पर झ्ोव-विपय स्वीकृत हुए । जैन-रामकाव्य के महनीय ग्रन्थो के साथ “रामचरितमानस' के तुलनातग्क अध्ययनों के निर्देशन के अतिरिक्त डॉ० दीक्षित जैन कृष्णकाव्य-परम्परा के महार्घ रत्न “हरिवदा- पुराण' और हिन्दी कृष्णकाव्य परम्परा के महान्‌ ग्रन्थ “सुरसागर' के तुलनारमक अध्ययन का, मेरठ विद्वविद्यालय में, निर्देवन कर रहे हैं। यह अध्ययन मेरे अनुज चि० श्री विष्णुकान्त शुक्ल एम. ए (हिन्दी-संस्कृत ) , साहिंत्याचार्य, प्राव्यापक, हुन्दी-विभाग, जे. वी. जैन कालेज, सहारनपुर द्वारा किया जा रहा है जो जीघा ही विद्वानों के सम्मुख प्रस्तुत होने वाला है । नोव-ग्रस्थ के प्रकागन के अवसर. पर मैं डॉ दीक्षित के सौहादें एव पाण्डित्य के प्रति माभार प्रकट करता हूँ । प्रस्तुत दबोघष-प्रवस्घ के लिखने मे अपने निर्देगक के अतिरिक्त डॉ० ए. एन. उपाब्ये, एम. ए. डी लिट (कोल्हापुर), डॉ० अगरच्द सनाहटा (बीकानेर); महामहदोपाव्याय विनयसागर जी (जोधपुर) , डॉ? ज्योतिप्रसाद जैन (लखनऊ);




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