फूलों की डाली | Phoolon Ki Dalee
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
143
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)परतो दिले सोजां में हे उस जुव्फ खियहका ।
चैसाख्म सावनंकी घटा देख * रहे हैं ॥
“नह” नारी
दिल छोटता है तोवा इधर टूट रही है।
मबखाने पर हम आज घटा देख रहे हैं ||
'आजाद' कलकत्ता ।
छाई हुई गुलशन पे घटा देख रहे हैं।
आई हुई तोवा पे बला पे बला देख रहे हैं ॥
एक अपनी बुराई तो नज़रमें चहीं आती |
हर चोज मगर उसके सिच्ा देख रहे हैं ॥अदीव”लखनवी |.
रफ्तार सिसेदही है तो खंजर है तबस्खुम ।कातिल तेरी एक एक अदा देख रहे हैं॥'निहाल' स्योद्दारवी
जी खोलके मातम भी कोई कर नहीं सकता। . '. 'सुदद उनका मेरे अहढे अजा देख रहे हैं ॥
पद कह नहीं सकता चह कोई खुन नहीं सकता ।
भांखोंसे जो हमे खुबहों साम देख रहे हैं ॥
नहा नहीं इस्जामे मुहब्बत था उन्हीं पर ।
कुछ इसमें दम अपनी ख़ता देख रहे हैं॥
नह” नारवी
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