वीर - त्थुई | Veer - Tthui

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Add Infomation AboutAatmaram Ji Maharaj
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
901 KB
कुल पष्ठ :
59
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१२ बीर-त्युईतदा एप जायते सच््वहीन: ( स्वत्वहीनः ) यथा! इक प्रयाहारस्यदशा दृद्यते । ]
११ एत्थ सो एवं झाटिज्जेश जो जस्स गुशाइडि
झआसल्नो होइ, वागरणेवि एवमेव दीसेइ ।[ इद स एवं आद्रियते यः यस्य गुणादिमि: 'आसन्नो
भवति, व्याकरणे5पि एवमेव दृद्यते । 1]१२ पोग्गलसंसग्गमावन्नों जीवों स-सरूवाउ चवेइ
शावि चवेह चित्तस्स दटभावेण अदटभावापेक्खाए वा, जहा
सद्दागमे ।[ पुद्ठलसंसगैमापन्नो जीव: स्वस्वरूपात् च्यवति नापि
च्यवति चित्तस्य दृढ़ भावेन अदूढभावापेक्षया वा 1१३ बंक॑ दडश उज्जू वा बंको वा सब्वों पायेण लहू
होइ जहा वायरणे ।११ ज्ञा० आासन्न: १1१७ ।इह आसन्न-अनासब्रप्रसंगे स्थानगुणप्रमाणादिभि: एव
विधिरुपात्तो वेदितब्यों लोकाग्रम् , मुनीन्द्र: ।पा० स्थानेडन्तरतम: १।१।५०३१२ शा० ह्लस्वो बाघपदे १1१1७ढ४ ।इक: स्थाने5स्वे अचि परे ह्लस्वादेशो व। भवति । नदि एवा । नहोदा ।पा० इकोज्सवर्ण१३ ऋत्यक: ११1७५ ।श्रक: स्थाने ऋति-ऋकारे लकारे च अचि परे ह्लस्वो वा भवति ।
सह ऋषि:--महषि: । घूलिलृतः--चूल्य्लूत: ।
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