हर्षवर्द्धन | Harshavarddhan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
14 MB
कुल पष्ठ :
290
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भारत की राजनीतिक श्रवस्था ३६४,उतिरिक्त संभव है कि युप्तवबंश' के प्रतिष्ठाता चंद्रग॒प्त प्रथम ने लिच्छवियों की सहायता से
जिस 'मगघकुल” के राजा से मगध देश को जीत लिया था वह मौखरि वंश का ही रहा
हो । यह श्रनुमान हाल में आआविष्कत “कौमुदीमहोत्सव” नामक नायक पर अवलंबित है ।*मौखरि नाम के दो विभिन्न राजवंश थे । उन की सुख्य शाखा उस प्रदेश पर
शासन करती थी जिसे श्राजकल संयुक्तप्रांत कहते हैं । बाण के एक कथन से प्रकट होता है
कि उन की राजधानी शायद कन्नौज में थी * । मुख्य शाखा के अतिरिक्त एक करद वंश था
जो गया प्रदेश पर राज करता था । गया के उत्तर-पूव १५, मील की दूरी पर स्थित बरावर
श्र नागार्जनी पहाड़ियों के गुफा-मंदिर के लेखों से हमें इस वंश के तीन नाम शात हैं--
उनंतवर्मा, उस के पिता शादलवर्मा तथा पितामहद यश्वर्मा* । इन तीनों राजाओं का
शासन-काल पाँचवीं शताब्दी निर्धारित किया गया है” । लिपि-प्रमाण के श्राधार पर वे
छुठी शताब्दी के पूवाद्ध' के पीछे नहीं हो सकते * | इतना स्पष्ट है कि वे शुप्त सम्राटों के
सामंत थे । मौखरियों की प्रधान शाखा जो झ्ारंभ में गुप्त राजाशओं की शधीनता स्वीकार
करती थी, अपनी उन्नति कर के उत्तरी भारत की प्रधान शक्ति बन गई । इस वंश के
प्रथम तीन सौखरि राजाओं के नाम हरिवर्मा, आदित्यवर्मा तथा ईश्वरवर्मा थे । इन तीनों
में से ईश्वरवर्मा ( ५२४--४५० ई० ) वस्तुतः एक वीर पुरुष था । सर्वप्रथम उसी ने अपने
वंश की प्रतिष्ठा बढ़ाई ।* ज्ञात होता है कि इन प्रारंभिक सौखरि राजाओं ने गुप्त-राजाओं
के साथ वैवाहिक संबंध जोड़ा था । प्राचीन भारत में दो राजवंशों के बीच, विवाह का
संवंध प्रायः राजनीतिफ दृष्टिकोण से स्थापित किया जाता था । यूरोप के इतिहास में भी इस
प्रकार के विवाहों का उल्लेख मिलता है। शुप्तबंश के राजा कूटनीति-विद्या में बड़े
निपुण॒ होते थे। झवसर पा कर वे ऐसा संबंध जोड़ने में कभी चूकते नहीं थे। चंद्रगुप्त
प्रथम ने लिच्छुवियों के साथ जो विवाह-संबंध स्थापित किया था उस का क्या फल हुश्रा
यह हमें भली माँति शात है । चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी श्पनी पुत्री प्रमावती का विवाद,
दक्षिण के मध्य भाग के वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय के साथ किया था । बुंदेलखंड' १देखिए, एडवार्ड ए. पिरेज्, 'दि सौखरिज़ञ'--( १९३४ )--प्रथम परिच्छेद, पृष्ठ२४-३९रमत्तुदारिकापि राज्यश्नीः कान्यकुलजे कारायां निश्षि्ता--हर्पचरित, एष्ट २११चैफ़्लीट--'कार्पस इंसक्रिप्टियोजुम् इंडिकारंम' जिर्द ३, लेख न० धयदन४१, पृ
२२१-२२८मगवानलाल इंदजी घर ब्यूलर--'इंडियन एंटिक्वेरी', निरद ११, पृष्ठ ध्पद की
रिप्पणी ।श्कीलहान --“एपिघाफिया इंडिका', जिर्दू ९, एप्ट ३धजौनपुर का लेख जो बहुत अस्पषप्ट है, शायद ईशानवर्मा कीं विजयों का उल्लेख
करता है, जैसे--श्रंश्रपति को 'जो विलकुल भयभीत हो गए थे” झपने अधीन करना--देखिए,
'कार्पस इंसक्रिप्टिगो चुम, इंडिकासस” जिलट हे, पृष्ठ ३३० ः
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