श्री चंद्रप्रभ चरित्र | Shri Chandra Prabh Charitra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१५) डाला । चक्रकदर्तीका यह रृदइय देखकर वेराग्यकों प्राप्त होना । योगल्पर गुणप्रभके द्शन करना और इन्दी योगीराजसे चक्रवर्ती अजितसेनकों मुनि दीक्षा छेना, तप कर अच्युतत स्वगंमें उत्पन्न होना और वहां २९ सागरके सुख भोगकर कनकप्रभ राजाके यहां पद्नाभ पुत्र होना | पद्मनासका विचढछित गजराजकों वश करना । चारहवां सग-- ..... शुर९-र४० एक दूतका साना और अपने राजाका संदेश खुनाना, हाथी वापिस दो या सुद्धकी तेयारी करो । मन्त्रियोंसे परामर्श करना छौर दृत्तसे कहना कि एक माह बाद या तो द्ाथी वापिस देंगे या युद्ध करेंगे । सेरदवों सम-- _ १४४-१४८ न्श ल्र लि युद्धकी तैयारी और युद्धके छिये प्रस्थान, शप्राम नगर बनभश्री एवं सनाका वर्णन । व के हु चवोददबा सग-- श४७९,-श५७ मणिकूट पवत्त-वैभव वर्णन, विद्याधरों एवं किन्नर देवोंकी क्रीड़ा चणेन । 'पंद्रहवां सग-- श्भ८- २७३ शान पक्के राजा प्रथ्वीपाटके साथ युद्ध व्णन-युघराज सुवणे- लामका धघमंपालकों नन्दी (कद) करना, पद्मनाभके द्वारा प्रथ्वी याछका सिर काटना, इस हृर्यसे पद्मनाभको चेराग्य प्राप्त होना छझीर जंगछमें दी युचराज सुवर्णनासको राज्य देना, और श्रीघरमुनिके पास परस हंस मुद्रा घारण करना, १६ कारण भावनाओंका खिन्तचन करना । अन्त समय शरीर छोड़कर विजय नामक अनुत्तर विमानमें अदमिन्द्र दोना । सोखहवां सर्ग-- शु७३-श८२ प्वन्द्रपुरी नगरका वर्णन, 'महासेन राज्ञाका वर्णन, उक्ष्मणारानी का चणन, राजा मद्दासेनकी विजययात्रा वर्णन, कुबेर द्वारा 'चन्द्रपुरीकी




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