स्वर्ण किरण | Swarn Kiran

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Swarn Kiran by श्री सुमित्रानंदन पन्त - Sri Sumitranandan Pant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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' स्वर्ण किरण वहिरंतर जड़ चेतन वैभव संस्कृति में कर निखिल समन्वित ! सहदयत्ता का सागर हो मन हृदय शिला हो प्रेरणा सरित , भू जीवन के प्रति रुचि जन में मानव के प्रति सानव प्रेरित ! प्राणों के स्तर स्तर में पुलकित अमर भावनाएँ हों विकसित , प्रीति पाद में बँध सुंदरता काम भीति से हो. अकलंकित ! देव वृत्तियों के संगम में डूबें चिर. विरोध संघर्षण , जीवन के संगीत में अमित परिणत हो धरती का क्रंदन_! ऊध्वेंग श्ंगों के समीर को आओ, साँसों से उर में भर चिर पवित्रता से हम तन का समन का पोपण करें सिरंतर ! मुक्त चेतना के प्लावन सा उमड़ रहा रजतातप निर्भर , आज सत्य की बेला वहती स्वप्नों के पुलिनों के ऊपर !




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