हरिशचंद्र तारा | Harishchandra Tara

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Harishchandra Tara by जुगराज सेठिया - Jugraj Sethia

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रानी का निष्दय ] [ १७ त्याग है। अत मैं त्याग को ही भपनाऊगी और विलासकारी कार्यों से चिरक्‍त हो अपने प्राणाधार को मोह के दलदल से निकाल कर दिखला दूंगी कि स्त्री-प्रेम कैसा होता है ? स्त्रिया क्या कर सकती हैं और स्त्रियों का क्या कतेंव्य है ? अपने पति को मोहावस्था से जायूत करू गी। मैं वैरागिन तो नहीं वत्तू गी परन्तु उस श्र गार को अवश्य त्याग दूगी जो मेरे पति को, मेरे ससुर के निर्मल वद्य को, एक राजा के कतंव्य को और पुरुप के पुरुषार्थ को कलकित कर रहा है । पति मुझे प्राणो से भी प्रिय हैं, वे मेरे पूज्य हैं अत उनसे प्रेम नहीं त्याग गी । लेकिन उनकी मोहनिद्रा को भग करने, उन पर लगे कलक को घो डालने के लए मैं कष्ट सहकर भी पति को क्तंव्यपरायण बना ऊगी । उनकी गणना नीतिज्ञ तथा प्रजावत्सल नरेश मे कराऊगी । साथ ही स्त्रीजाति के लिए आददों उपस्थित कर दूंगी कि अपने आराध्य-देव पति को किस प्रकार नम्रता, त्याग और तपस्या से सन्मार्ग पर लाया जा सकता है । मैं अपने पति की हित-कामना से उनकी विक्षिका वनू गी और ऐसी दिक्षा दू गी कि जिससे वे स्वय ही मेरी प्रशसा करें । कहा तो माज की वे स्त्रिया जो पति को अपपे मोहपाण में आवद्ध रखने के लिए अनेक उपाय करती हैं, जाहू-टोना कराकर पत्ति को वश मे रखने की चेष्टा करती हैं और फिर उसे अपने वद्द मे पाकर, अपना झाज्ञाकारी सेवक जानकर प्रसन्न होती है, अपना गौरव समझती हैं भौर फिर अपने दोतो जनो के सर्वेनादय का कुछ भी ध्यान नही रखती हैं । लेकिन कहा वह तारा जो पति को अपने मोहपाण से छुड़ाने, उसे कर्तव्य-पय पर स्थिर करने और कलक से वचाने का उपाय कर रही है। तारा के समान स्त्रियों ने ही आाज भारतीय स्त्री का गौरव रखा है। देखते-ही-देखते रानी ने उन वस्थाभूपणो को, जिनके धारण करने पर उसकी युन्दरता सोने मे सुगव की तरह वढ जाती थी, जो उसे विशेष प्रिय थे, जिन्हें अपने रुप-लावणष्य की वृद्धि मे सहायक मानती यो, एकदम उत्तारकर फेक दिया और ऐसे सावारण वस्थाभुपण पहन




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