शरत साहित्य [34-३५] | Sharat Sahitya [34-35]

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Sharat Sahitya [34-35] by शरतचंद्र - Sharatchandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ए शेष परिचय, मैट्कि कञासके लड़के पढ़ाने होंगे, उन्दे पास कराना दोगा--वह क्वालिफिकेशन +( योग्यता ) क्या...” तारकने कद्दा--वे लोग कालिफिकेशन नहीं चाहते । वे चादते थे यूनिव- सिंटोकी छाप ( सर्टिफिकेट )। वे सब “* मार्के ” मैंने कर्ता-घर्ता छोगोंके दरवारमें पेश किये--भजी मजूर दो गई। लड़के पढानेका मार मेरा है, लेकिन उन्दें पास करानेका दायित्व उनका है । राखालने गर्दन हिंलाते-दहिलाते कहदा--यह कहनेसे काम नहीं चलता भाई, “काम नददीं चलता । इसके वाद ही गभीर होकर राखालने कदा--लेकिन मुझसे भी तो तुमने सच चात नहीं कद्दी तारक । कद्दा था कि तुमने कुछ अधिक पढ़ा लिखा नहीं । तारकने इईसकर क्द्वा--अब भी वहीं कदता हूँ--युनिवर्सिटीकी छाप है, लेकिन जिले यथार्थ पढ़ना-लिखना कहना चाहिए, वह नहीं हुआ । उसके लिए समय दी कद्दों पाया ! किताबें रटनेकी पाली समाप्त होते दी नौकरीकी उम्मेद- चारी में लग गया । इसमें दो-तीन साल गुजर गये । उसके वाद देवसयोगसे तुमसे परिचय हुआ और तुम्दारी दयासे कलकत्ते आकर साधारण खाने-पद्ननेको पा नददा हूँ । राखालने कदा--देखो तारक, फिर अगर तुम. « « अकस्मात्‌, सामनेके आईनेमें दोनों मित्नोंके प्रतिवियके सिरपर और एक छाया दिखाई पड़ी । वह नारी-मूर्ति थी । दोनोंने घूमकर देखा--एक अपरिचित मदिला लगभग फमरेके मध्यभाग्यम भा खड़ी हुई हैं । बेशक मद्दिला ही हैं । अपस्था शायद योपनके दूसरे सिरेपर पैर बढा चुकी है, किन्तु यदद वात नजर जहीं आती । रंग वहुत ही गोरा है, शरीर छुछ रोगी-सा है, लेकिन सारे अगोमि असीम मर्यादाका भाव भरा हुआ दे । मायेपर सोहागका चिढ् है । गरदकी साड़ी पढ़ने दे । दाय-गढेमे दो-एक प्रचलित साघारण आभूषण जसे सामाजिक री तिका पालन करनेफे ठिए ही पदन रखे है । दोनों ही मित्र उछ देर स्तच्घ विस्मयसे ताझऊते रहे । एकाएक रायाल दुर्सी उोपकर यद कदता हुआ उछल पढ़ा--“ यद क्या | नई-मा हूं 1” इसके वाद ही चंद उनके पैरॉपर पट पढ़ गया । दोनों परोंपर सिर रखदूर उसका यह सांग पणाम जैसे नमाप्त ही दोना नहीं चादता या 1




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