लोक - विभाग | Lok - Vibhag

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Lok - Vibhag  by बालचन्द्र सिद्धान्त शास्त्री - Balchandra Siddhant-Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना दे १५ निर्देश क्ररके आगे उनके इस निवासस्थानकी ऊंचाईके प्रमाणके साथ आयुका भी प्रमाण बतलाया गया है । तत्परचात्‌ वैमानिक देवोंके कल्पज और कल्पातीत इन दो भेदोंका निर्देश करके बारह कल्पभेदोंका उल्लेख इस प्रकारसे किया गया है-- १ सौंधर्म २ ऐशान ३ सनत्कुमार ४ महेन्द्र ५ ब्रह्मलोक ६ लान्तव ७ महाशुक्त ८ सहल्ार ९ आनत १० प्राणत ११ भारण और १९ अच्युत । इसकी संगति यहां विलोकसार की ' सोहम्मीसाणसणवंकुमार-' इत्यादि तीन (४५२-५४) गाधाओंको उद्घृत करके इन्द्रोंकी अपेक्षासे बेठायी गई है । इन कल्पोंके ऊपर क्रमसे तीन अधोग्रैवेैयक, तीन मध्य ग्रवेयक, तीन उपरिम पग्रेवेयक, नौ अनुदिश, पांच अनुत्तर विमान और अत्तमें ईपत्माग्भार पृथिवीका अवस्थान निर्दिष्ट किया गया है। समस्त विमान चौरासी लाख (८४०००००) हैं। ऊध्वलोकमें जो ऋतु भादिं तिरेसठ (६३) पटल हैं उनके ठीक बीचमें इन्हीं नाभो- वाले तिरेसठ इन्द्रक विमान हैं । इनमें सौधर्म-ऐशानमें इकतीस, सनत्कुमार-माहेन्द्रमें सात, ब्रह्ममें चार, लान्तवमें दो, महाशुक्रमें एक, सहल्ारमें एक, भानतादि चार कल्पोमें छह, तीन अधोग्रैवेयकोंमें तीन, मध्यम तीनमें तीन, उपरिम तीनमें तीन, नौ अनुदिशमें एक और भवुत्तर विमानोंमें एक ही पटल है” । जिस प्रकार तिलोयपण्णत्तीमें * सोलह कल्पविषयक मात्यताभेदका उल्लेख करके उन उन कह्पोमें विमानसंख्याके कथनकी प्रतिज्ञा करते हुए भागे तदनुसार उनकी संख्याका निरूपण किया गया है ठीक इसी प्रकारसे यहां (१०-३६) भी उक्त मान्यताका निर्देश करके सोलह कल्पोंकि आश्रयसे विमानसंख्याका कथन किया गया है। इस प्रसंगमें आगे जेसे ति. प. में *े आानत-प्राणत और आरण-अच्युत कल्पोंमें वह विमानसंख्या एक मतसे ४४०--२६०--७०० तथा दूसरे मतसे ४००--३००न-७०० निर्दिष्ट की गई है ठीक उसी प्रकारसे उन दोनों ही मान्यताओंके आश्रयसे यहां (१०, ४२-४३) भी वह संख्या उसी प्रकारसे निर्दिष्ट की गई है । इसके आगे ग्रैवेयकादि कल्पातीत विमानोंगें भी उक्त विमानसंख्याका निरूपण करते हुए संख्यात व असंख्यात योजन विस्तृत विमानों, समस्त श्रेणीबद्ध विमानों तथा पृथक्‌ पृथक्‌ कत्पादिके आश्रित श्रेणीबद्ध विमानोंकी संख्या निर्दिष्ट की गई है | प्रथम ऋतु इन्द्रकका विस्तार मनुष्यछोक प्रमाण ४५ लाख यो. है। इसके भागे द्वितीयादि इन्द्रकोंके विस्तारमें उत्तरो्तर ७०९६७ यो. की हानि होती गई है। अन्तिम सर्वा्थेसिद्धि इन्द्रका विस्तार १ लाख यो. है । यहां इन विमानोंमें कितने श्रेणीवद्ध विमान किस १. को, वि १०, २५-३५; ति. प. ८, १३७-४७; विलोकसार (४६२) में इन कल्पाश्रित इन्द्रकोंकी संख्या मात्रका निर्देश किया गया है, कल्पनामोंका निर्देश कर उनके साथ संगति नहीं बैठायी गई है। परन्तु ठीकाकार श्री माधवचन्द्र त्रविद्य देवने १६ कल्पोंके आश्रित उनकी संगति बैठा दी है! २.जे सोलस कप्पाई केई इच्छंति ताण उपएसे । तस्सि तस्सि वोच्छ॑ परिमा्णाणि 'विभाणाणं ॥ ति.प टन १७८, ३... आणदपाणदकप्पे पंचसया सट्ठविरहिदा होंति । आरणअच्चु दकप्पे दुसयाणि सद्ठिजुत्तार्णि ॥ अहवा आणदजुगले चत्तारि सयाणि वरविमाणाणि । मारणबच्चुदकप्पे सयाणि तिथण्णि च्चिय हूवंति ॥ ति. प. ८, १८४ ८५ -




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