जैन तत्व चिन्तन | Jain Tatv Chintan

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Jain Tatv Chintan  by जयचन्दलाल दफ्तरी - Jaichandlal Daftari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भ० | जैन तत्व चिन्तन-विज्ञान का बहुत महत्वपूर्ण सिद्धात्त समझा जाता है श्रौर तुला यन्त्र द्वारा किसी भी समथ उसकी सचाई की परीक्षा की जा सकती है |पुरुष नित्य है श्र प्रकृति परिणामि-नित्य, इस म्रकार सांख्य भी नित्यानित्य- त्ववाद खीकार करता है । नैयायिक श्रीर वेशेषिक परमाएु, आत्मा झादि को नित्य मानते हैं तथा घट, पट आ्रादि को श्रनित्य । समूहामेक्षा से ये भी परिणामि-नित्यलवाद को खीकार करते हैं किन जैन दर्शन की तरह' द्रव्य मात्र को परिणामि-नित्य नहीं मानते । महर्षि पतज्लि, कुमारिल भट्ट, पार्थसार मिश्र आदि ने 'परिशामि-नित्यलवाद' को एक स्पष्ट सिद्धान्त के रूप में खीकार नहीं किया, फिर भी उन्होंने इसका प्रकारान्तर से पूर्ण समर्थन किया है। जेन-दर्शन के अनुसार जड या चेतन, प्रत्ेक प्रदार्थ श्रयात्मक है--उपाद-व्यय-्रीव्ययुक्त”” है। इसी का नाम परिणामि- नित्यत्व है ।दब्य घृद हैं: १: धर्माखिकाय । २: श्रघर्मासिकाय | ३४ श्राकाशास्िकाय | ४५ काल | ५४ पुदुगलाखिकाय । ६ ४ जीवास्तिकाव | भगवान ने कहा-“भीतम ! गलति-्सहायक द्रव्य को मैं धर्म कहता हूँ । स्थिति- सहायक द्रव्य को मैं श्रघर्म कहता हूँ । आधार देने वाले द्रव्य को मैं आकाश कहता हूँ । परिवर्तन के निमिततभूत द्रव्य को में काल कहता हूँ । स्पर्श, रस, गन्ष श्रौर रूपयुक्त द्रव्य को मैं पुदुगल कहता हूँ । चेतनावान्‌ द्रव्य को मैं जीव कहता हूँ।”धर्म और अधर्म गजैन-साहित्य में जहां धर्म-अधर्म शब्द का प्रयोग शुभ-श्रशभ प्रदृत्तियों के श्रर्थ में होता है, वहाँ दो खतन्त्र धरव्यों के सर्थ मे मी होता हैं. धर्मरतितत्त है; उधम पृस्पतिल ! दार्शनिक जगत में जैन दर्शन के सिवाय किसी ने भी इनकी स्थिति




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