सूरदास | Soordas

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Soordas  by प्रभुदयाल मीतल - Prabhudayal Meetal
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
4 MB
कुल पृष्ठ :
73
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अधट्न अथवा जन्माधता ७ जीवन - घत्तातअधत्व अथवा जन्माधता--सूरदास से सबधित अनुश्रतियो एव किवदतियों मे उनके अधत्व की बात सर्वाधिक प्रचलित हे। लोक मे 'सूर' और 'नेन्नह्वीन' समाना थैक माने जाते है, अत 'सूरदास' शब्द अधे के लिए रूढ सा हो गया है। इस सबक्ष में परपरागत मान्यता तथा समकालीन एव परवर्ती बाह्य साक्ष्यो के साथ ही साथ सूरदास * की रचनाओ के अत साक्ष्य से भी उनका नेत्रह्वीन होना प्रमाणित हैं । सूरसागर की हस्तलिखित एव मुद्रित प्रतियो मे ऐसे अनेक पद है, जिंनमे सूरदास के अधत्व का उल्लेख है । यहा पर इस प्रकार के कतिपय पदों की आरभिक पक्तियाँ दी हैं,*---१. इहै जिय जानिक॑ अध भव घ्रास तें; 'सुर' कामी-कुटिल सरत आयौ ।४। सुरदाम' सो कहा निहोरो, नेननि हू की हानि ।१३४। 'सूर' कूर आधरो, हो द्वार परयौ गाऊ 1१६६! 'सुरदास' अथध अपराधी, सो काहै विसरायो ? ।१६०। 'सूर' कहा कहे दिविघ आधरो, बिना मोल कौ चेरो । या भुठी साया के कारन, दुहें दुग अथ भयौ 1२४१जन्माधता विषयक शका--सुरदास जी दृष्टिहीन थे, यह सवमान्य तथ्य है। इसमे किसी प्रकार की शंका अथवा कोई विवाद नही है । शकी एवं विवाद की बात यह है कि वे जन्माध थे, अथवा बाद में किसी रोग अथवा अन्य कारण से अधे हो गये थे । इस प्रकार की शका का कारण सूरदास जी के महान क़तित््व की सपुणता एवं सवाँगी 7 ता है । उन्होने अपनी रचनाओं मे दृश्य जगत्‌ की भौतिक वस्तुओ एव प्राकृतिक पदार्थों के रूप-रगो, मानवीय हाव-भावों एब मुख-मुद्राओ, शारी रिक चेष्टाओ तथा ससार के अनत क्रिया « कलाप का यथाथ, सूक्ष्म एवं सर्वागपुर्ण व थन किया है। उनके द्वारा कथित रू:क अप्यत सागोपाग और उनकी उपमाएँ एवं उत्प्रेक्षाएँ सबधा स्वाभाविक हैं । यह सब आखो से देखे बिना केवल कल्पना अथवा सुपी-सुनायी बातो के आधार पर प्रस्तुत किया जाना सामाय रूप मे सभव नही मालूम होता । इसलिए कुतकंशील ही नही, प्रजुह्ठ व्यक्तियों का भी 3 चुमान रहा है कि सूरदास जन्माध नहीं होगे। उन्होंने पर्याप्त समय तक जीवन एबं जगत की विभिन गति - विधियों को बडी तललीनता एवं सुक्ष्मता पुवक अपनी ब्गखो से देखा होगा । उसके उपरात व किसी समय किसी कारण से दृष्टिहीन हो गये होगे । क्तु यह अनुमान मात्र है, इसमें वास्तविकता लेश मात्र भी नही है । वस्तुत्त सुरदास जी अतद्‌ ष्टि सपनन महात्मा थे । उन्हें भगवद्‌ - अनुग्रह से दिव्य दष्टि प्राप्त थी, जिससे वे जन्माध होते हुए भी जीवन और जगत की समस्त गति - विधियों को देखने और उनका यथाथँ एव यथावत्‌कथन करने मे पूर्णयता समथ थे । इसका कारण उदहोने स्पष्ट रूप से भगवान कीन ८ २८ छाजिन पदों से सय्या का उल्लेख है, वे ना प्र सभा द्वारा प्रकाशित सुरसागर के हैं । सख्या रहित पद हस्तलिखित प्रतियो के है ।




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