रूंखा | Roonkha

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : रूंखा  - Roonkha

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about मुखड़ा बिज्जी - Mukhada Bijji

Add Infomation AboutMukhada Bijji

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
बात है? जिसे अपने पर पुख्ता विश्वास नहीं होता, वह भला दूसरों पर क्या विश्वास करेगा ? हिन्दी के उन आत्म-विमुग्ध लेखकों के विश्वास या अविश्वास की मुझे दरकार भी नही है। मुझे अपने पर विश्वास है और मेरे अगोचर पाठकों का मुझ पर अगाध विश्वास है--चाहे वे कितनी ही अल्प संख्या में क्यों न हों 1 गणना तो एक से ही प्रारंभ होती है, पर इसका अन्त... ! सो लिखित रूप में सबसे पहले मांगलिक शुरुआत की थी गोपाल भारद्वाज ने । निस्संकोच बताना चाहूंगा कि गोपाल भारद्वाज मेरा घनिष्ठ सित्र है--जोधपुर विश्व विद्यालय में समाज-शास्त्र का प्राध्यापक । नाम-मात्र का ही नहीं, सचमुच प्राध्यापक । अब भी उसे पढ़ाने की बजाय पढ़ने का ज्यादा शौक है। रुचि भी परिष्कृत है। आधुनिक सिनेमा, चालू संस्कृति, मनोरंजक पत्र-पत्रिकाओं तथा व्यावसायिक प्रकाशनों ने उसकी रुचि को शभ्रप्ट नहीं किया । 'दूजौ कबीर' कहानी पढ़ कर, उसने दो-चार पंक्तियों में ही ऐसी उत्फूल्ल प्रशंसा की कि मैं हतप्रभ रह गया । पहली वार अपने सृजन के प्रति मैं सचेत हुआ । उसे अपने जीवन से अलग करके देखने का सवंप्रथम यत्किचित्‌ अहसास हुआ | खुशी भी हुई । थोड़ा-बहुत प्रमोद भी हुआ । थोड़ा अविश्वास भी हुआ । कई बार उन पंक्तियों को वांचा । वास्तव में दुनिया जीने काबिल तो है ! उस सराहना में अपने सृजन की स्वतंत्र प्रतिच्छवि दिखलायी पड़ी । आज तुम्हें पहली बार वता रहा हूं कि 'दूजौ कवीर' के माध्यम से मैंने अपनी आत्म-यंत्रणा का मवाद ही बिखेरा है । इसे मेरी आत्म- कथा ही समझो । यों इस कहानी में वर्णित एक भी घटना का मेरे जीवन से दूर का भी संवंध नही है, पर मैंने अपने अध्ययन व सृजन के साथ आजीवन यही रिश्ता वरता है; और पत्थर की तरह सब-कुछ चुपचाप सहा है । आखिर घूम-फिर कर लेखक की रचनाएं उसका नियोजित स्वप्न ही तो हैं ! विद्या-भवन, उदयपुर में एक और प्राध्यापक है--वेददान सुधीर । काफी निकट का रिश्तेदार । मेरी कथाएं मौखिक रूप से सुना-सुना कर, उनकी व्याख्या करके उसने इतना प्रचार किया है कि क्या बताऊं तुम्हें? वाणी के शब्दों को तोलने का कोई यंत्र भी तो ईजाद नही हुआ । यदि उसके द्वारा उच्चरित शब्द ठोस, स्थूल रूप से एक जगह शामिल होते रहते तो अब तक छोटा-मोटा पहाड़-सा निर्मित हो जाता ! वह जब भी उदयपुर से गांव आता सिवाय मेरी कथाओं के दूसरी कुछ भी चर्चा नहीं करता । एक के वदले हजार मुंह भी होते तो वह मेरी प्रशंसा करते कभी नहीं अघाता । तभी तो महेन्द्र कात्तिकेय की भत्संता-मूलक समीक्षा पढ़ कर वह उबल पड़ा । किन्तु उसकी मौखिक प्रशंसा ने मुझे कभी प्रभावित नहीं किया । यह तो अपने मुंह से अपनी ही प्रशसा है। सच कहूं शिशिर, कि महेन्द्र कात्तिकेय की टिप्पणी भी मुझे अप्रत्याशित नहीं लगी ; क्योंकि राजस्थानी के अधिकांश लेखक व पाठक मेरी जी-भर कर निन्दा ही करते हैं । वे लेखक कौन हैं, कैसे हैं, क्या हैं, इसका हवाला देकर अपनी कलम का मुंह कलंकित नहीं करूंगा । हर भाषा की ऐसी विडम्वना रही है, इस में अनहोनी जैसी कोई वात नही । सृजन की वुलंदी के दौरान भी इस माजने के बंगाली लेखक, पाठक व संस्कृत के तथाकथित पंडितों ने रवि वावू की क्या कम भत्संना की है ? कम खिल्‍ली उड़ायी है ? इनके मुंह से प्रशंसा के वोल निकलें तो विज्जी उन्नीस




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now