मंजुल मयंक व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व | Manjul Mayank Vyaktittv Avam Kritittv

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सर्वश्रेष्ठ गीतकारों में गणना होने का यही रहस्य है |” मयंक जी मूलतः कवि, उपन्यासकार एवं नाटककार थे। उन्होंने साहित्य की विविध विधाओं द्वारा राष्ट्रभाषा के भण्डार में अभिवृद्धि की है। वे ऐसे युग के कवि हैं जिस युग में कविता छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, हालावाद, क्रान्तिवाद, सौन्दर्यमय एवं शून्यवाद आदि विभिन्न वादों की धाराओं के बीच प्रवाहमान थी, परन्तु मयंक जी किसी वाद के वादी नहीं थे, वे सिर्फ कवि थे। कवि-कर्तव्य के प्रबल आवेग से युक्त उनका काव्य समस्त काव्य सरोकारों की पूर्तिकर्ता दिखायी देता है। इस प्रकार मयंक जी का काव्य किसी भी वाद तथा आन्दोलन से मुक्त है। वे स्वच्छन्द हैं और अपने ही व्यक्तित्व के अनुचर एवं अनुवादक है। कोई एक वाद अथवा विषय उन्हें काव्य-रचना हेतु प्रेरित नहीं करता, वे बन्धन-विवश न होकर स्वतन्त्र परिचालित हैं। एक तथ्य यह भी कि वे साहित्य और कला का स्रोत और लक्ष्य जीवन को स्वीकार करते हैं तथा 'कला-कला के लिये' सिद्धान्त का विरोध करते हैं तथा उसके लिये जिस फलक की अवतारणा करते हैं वह विस्तृत तथा व्यापक है। मयंक जी का रचना संसार हिन्दी साहित्य में मयंक जी का प्रमुख अवदान गीतिकाव्य के क्षेत्र में ही है परन्तु उनकी रूचियों का क्षितिज अत्यन्त व्यापक था। गीतों के साथ ही उनका दखल नाटकों ः तथा उपन्यास के क्षेत्र में भी था। यह अलग बात है कि ख्याति उन्हें गीतकार के रूप में ही ज्यादा मिली। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में मयंक जी की पहली दस्तक “रूपरागिनी' काव्य संकलन से हुयी जो 1952 ई0 में प्रकाशित हुआ, तत्पश्चात 1961 ई0 में 'तन-मन की भौँवरे' नामक उपन्यास तथा 1975 ई0 में “जनता ही अजन्ता है' (काव्य कृति त | इनके अतिरिक्त 'रूपमन्दिर' एवं कीर्तिकमल (काव्य कृति) तथा “गांव का. खे गये जो अभी तक अप्रकाशित ही है। . (7)




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