सरल नित्यपाठ संग्रह | Saralanityapath Sangrah

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Saralanityapath Sangrah by कस्तूरचन्दजी छावड़ा 'विशारद'-Kasturchandji Chhawada 'Vishaarad'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(६) देव पद करों प्रनाम ॥ ५ ॥ गरम अगाऊ धन- 'पति झाय । करी नगर सोभा झधिकाय॥ वरखे रतन पंचद्श मास । नमों पद्म प्रभु सुखकी रास ॥ ६॥ इन्द्र फर्निंद्र नरिन्द्र त्रिकाल । बानी सुनि २ होहिं' खुस्याल ॥ चारह सभा ज्ञानदा- तार । नमों सुपारसनाथ निद्दार ॥ ७ ॥ सुगुन छियालिस हें तुम माहिं । दोप अठारह कोऊ नाहिं ॥ मोह महातमनाशुक दीप । समों चंद अ्रमु राख समीप ॥ ८ ॥ वारह विध तप करम विचास । तेरह भेद चरित परकास)। निज झनिं भवि इच्छकदान । चन्दों पहुपदन्त सन सान ॥ ६॥ भधि सुखदाय सुरगतें आय । दसबिध घ्म क्यों जिनराय ॥ आप समाद सबनि सुखदेह । वन्दों सीतल धरि मन नेह ॥ १० ॥ समता सुधाकोपविपनाश । द्वादशांगचानी परकास ॥ चारि संघ श्रानन्ददातार । नमों 'खिझंस जिनेसुर सार ॥११॥ रतनत्रय सिरमुकुट विशाल । शो कंठ सुगुन म्निंमाल ॥ मुकत-




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