बीच का रास्ता | Beech Ka Rasta

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Beech Ka Rasta by नरसिंह राम - Narsingh Ram

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(६ २४) उसकी /छावहेलना न. कर सवी । कुछ क्षणों के क्ंसगं से उसके स्वभाष को में जान चुकी थी मुके विश्वास हो गया कि उसका चरित्र बुरा नहीं हे । वह मुमसे मित्रता स्थापित करना चाहता था जैसा कि उसके व्यवद्दार से प्रतीत होता था और उस जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति की उपेक्षा करना सरल भी नहीं था । ' नयुक्के कोइ श्रापत्ति नहीं है ।” मैंने मुस्करा कर उत्तर दिया । 'पघन्यवाद,” प्रसन्न होकर बह बाला-'ब शाप शीघ्र कपड़े बदलें । सम्मति सूचक सिर हिलाकर मैंने उसे नमस्ते किया श्ौर फिर घर की शोर चल पड़ी । द्वार पर मुड़ कर देखा यह तब भी मरी ही श्रोर देख रहा था । उसने अपने हाथ की रुमाल हिलाई श्रौर तब क्षण भर में उसकी रोल्स रायल आँखों से ग्रोमल हो गई । छ्छे छह मेरे भींगे कपड़े देख कर माँ ने बढ़बढ़ाना प्रारम्भ किया किन्तु बिना कुछ उत्तर दिये में अपने कमरे में जाकर कपड़े बदलने लगी । खड्लार मेज पर रवि की मुस्कराती हुई तस्वीर थी। हैं. रवि को प्रम करती थी किन्तु निधन रवि मेरी एक भी महात्वाकांक्षा पूरी करने में झसमथ था झोर अमरनाथ ? काश ! वह अमरनाथ की ही भाँति धनी होता । छह हे ्ि एक ही सप्ताह में बैरिस्टर श्रौर दम में 'अत्यन्त घनिषता हो गई हम साथ काफी हाउस जाते, सिनिमा देखते श्रौर कभी-कभी पीन होटेल में भोजन भी करते । और रवि ? बह मुझे उस सन्ध्या के बाद नहीं मिला 'और न मैंने




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