महाभारत (द्वितीय भाग ) | Mahabharat (dwitiya Bhag)

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Mahabharat (dwitiya Bhag) by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अध्याय ४ 1] ३ चनपे - ३८७ ऐसे कहा हुआ अपने जनों का प्यारा बुद्धिमान विदुर युधिष्टिर की अनुपात में फेर हास्तिनापुर आया ॥ २५ ॥ उस से महाते- जस्वी धृतराष्ट्र वोले-दहे घमज्ञ भाग्य से तुम आए दो, दे निष्पाप भाग्य से मेरा तुझे रपरण है ॥ २९ ॥ यह .कह ब्रिदुर को उसने गोद में छे जिया, और माथा चूमा, और कहा क्षमा कर हे निष्पाप जो मैंने कहा है ॥ २३ ॥ विदुर वोठे-हे राजन ! मैंने समा ही किया हुआ है आप मेरे परम गुरु ( बड़े ) हैं। यह मैं जल्दी आप के दर्बान के लिये आया हूं ॥ २४ ॥ मुझे जैसे पाण्ड के पुत्र हैं, बेमे ही हे भारत तेरे हैं, किन्तु वह दीन हैं, इस से इस समय मेरी बुद्धि उनकी ओर झुकती है ॥ २५ ॥ इस प्रकार आपस में अवुनय करके परम हुख छाभ करते भए॥ २६! अ० ४(व० १९-१३ ) कृष्ण और युधिष्टिर का सबाद सुक--भोजा। म्रत्रजिताद, श्रत्ता रण्णयश्चान्थके। सह । ' पाण्डबान दुःख सतप्ान, समाज्पुमडावन ॥ १. ॥ वोसुंदेव॑ पुर- स्क़स सर्चे ते क्षत्रियपमा। । परिवायापंविधिद्युघमराज युधि/रेठे- रम ॥ २ ॥ व्सुदेव उवाच-नैतत छृच्छ मलुमाप्तो भवाद स्थादू वसुपाधिप । यद्यू द्वारकायांश्यां राजन सलिहितः पुरा ॥ ३ ॥ आगच्छयमद झूत मनाहृतोपि कौंरवें: । वारंययं महूं झूत बहून दोषाने मदर्धयन्‌ ॥ '४ ॥ अधे-मोन, दृष्णि ओर अन्घक, पाण्डवों का. बनत्रापत सून कर दुःख से तपे हुआं के पातत उस महावन मे आए ॥ श्फ्षे ' बह सब क्ाबेयवर कृष्ण को आगे कर के धर्मराज युधिष्िर के सामने घेरा ढाल कर बैठ गए ॥ २॥ कृष्ण 'ोले-दे राजन: |




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