पुरुषार्थ नविन संशोधित और परिवर्धित संस्करण | Purusharth Navin Sanshodhit Aur Parivardit Sanskaran

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Purusharth Navin Sanshodhit Aur Parivardit Sanskaran by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना ती श्€ अदि श्राप के द्वारा वह अनुवाद महाकाव्य सम्पन्न हो सकता, तो हिन्दी को एक महती अमर कृति प्राप्त होती, और देश के बहुजन वर्ग के लिये सर्वसाह्विक रस-भावमय भागवतब्मूत का सहज स्रोत खुल जाता । इस विषय मे स्वयं श्रद्धेय श्री भगवान्‌ दास जी के विचारों को जानने के लिये, इस ग्रन्थ के £७वे पृष्ठ से श्रारम्भ होने वाले “भागवत का झन्‌- वाद” छिरस्क घक्तव्य को, तथा पू० ४७, ५७, ६६-१०४, हर, १६७- १६८, ४६० पर, उन के स्वकृत, मागवत के श्रनेक इलोकों के, हिन्दी पद्यनुवाद को देखना चाहिये ।' अपू्व “रससीमांसा” 'पुरुपार्थ' के तीसरे श्रध्याय मे रस' के सम्बन्ध का विदाद विचार हुमा हैं । इस अध्याय के पूर्व ही १०४ वें पृष्ठ पर, 'रसों की संख्या' का उपक्रम कर के, १२०वें पृष्ठ के वाद “रस-मीमांसा' प्रकरण का भ्रारम्भ होता हू ।* श्रागे, 'सादित्य श्रीर सौहित्व', “रस क्या है ?”, “उस के की भेद हैं?' इत्यादि (सुची को देखिये ) प्रकरणाथे-सूत्र-रूप दी्षकों के नीचे, रस- सम्बन्ध सभी बिज्ञातव्य विपयों पर जो मार्भिक विवेचन, इस ग्रन्थ में किया गया है वह सच-मूच सर्वथा श्रपुर्व हैं । रस-रहस्य-ग्रस्वेषण में श्रपने प्रयत्न का श्रौर तट्ठिदों के साथ एतट्विंघयक वार्तालाप का, जो इतिहास स्वयं ग्रम्यकार ने लिखा है, उसी से यह स्पष्ट थिदित होता है, कि आप की रस-विज्ञान-विपयक जिज्ञासा का सन्तोषप्रद उत्तर, विद्वानों से न मिलने पर, श्राप को स्वयं प्रगाढ़ प्रणिधान द्वारा, श्रव्यात्मसयोग5घिगम से रस- रहस्प की उपज्ञा करनी पड़ी । वस्तुतः रस-ज्ञान के विषय में जो प्रतिभा श्रद्धघ भगवान्‌ दास जी को प्राप्त हुई है, उस का कारण है, आप का अध्यात्मवित्तृत्व; साहित्यिक भ्नूसन्घान मात्र नहीं । क्यों कि प्रचलित संस्कृत वा हित्दी काव्य-साहित्य, कामशास्त्र, गुह्यसमाजागम, तन्न-प्रन्थ घर पढे, दल, ०, पर्व-९०, रै०९, १५२०३, १४५६, श्रादि | * अब १०७,




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