वैदिक कथाओं का आलोचनात्मक अध्ययन | Vadik Kathaon Ka Aalochanatmak Adhyayan

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Vadik Kathaon Ka Aalochanatmak Adhyayan by चन्द्र भूषण मिश्र - Chandra Bhushan Mishr

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रकाश की आँख मिचौली को निहारा : वैदिक कवि ने उसमे स्वर्ग से सीमाहरण की उद्भावना की * । उसने सूर्य को इन्द्र और चन्द्रमसू को गोतम कहा। सदैव साथ -साथ रहने के कारण रात्रि उसकी सहचरी और पत्नी है । दिन में लीन हो जाने के कारण वह अहल्या है। वह ऋषि की कल्पना मे इन्द्र-रूप सूर्य के पास अभिसरण करती है, उसकी गोद में छिप जाती है । अदित्य उसका जार हैं | इस प्रकार सारी की सारी प्राकृतिक शक्तियों से संवद्ध-संघटनाओं नक्षत्रीय गति-विधियों सृष्टि की उत्पत्ति इल सबसे संबद्ध प्रश्नों का उत्तर उसने अपने जाने - पहचाने प्रतिदिन के जीवन में अनुभूत घटनाओं तथा सामाजिक संबधों के अनुरूप कथाओं की कल्पना कर देने का प्रयत्न किया । इसके लिए उसने इनके सघटनाओं से संबद्ध उन शक्तियों का दैवीकरण के साथ -साथ मानवीयकरण भी किया । उसे अवयवों से संयुक्त किया और कथाओं को जन्म दिया । सच तो यह है कि जैसे ही किसी प्राकृतिक - घटना से संबद्ध -शक्ति को मूर्त रूप दिया गया होगा | इस प्रकार पुरातन कथाओं का मूल तद्‌्युगीन -मानव -मन है, जिसने प्राकृतिक - शक्तियों को मानव के समान शरीरी मान लिया गया। इन्हीं कथाओं का बहुविधि विस्तार ब्राह्मणों में प्राप्त होता है । इन ब्राह्मण- ग्रन्थों में कर्मकाण्ड की संगति के लिये 'देवासुर - स्पर्धा' इन्द्र -वृत्र-युद्ध' 'देव -यजन' तथा “सृष्टि- रचना' संबंधी कथाओं को अनेक प्रकार से कल्पित और विनियुक्त किया गया है | इसके अतिरिक्त संहिता तथा ब्राम्हणों दोनों में ही लौकिक- व्यक्तियों से संबद्ध घटनाएँ भी कथा रूप में उपनिबद्ध हुई है । कालान्तर में उन कथाओं में पर्याप्त विकास हुआ । कभी -कभी तो कथा मूल घटनां से इतनीं दूर चली गयी है कि मूल तथा उसकी विकसित कथा दोनों * ऋण्सं० १० ,/१० २ अहल्यायै जार: शत०्घा० ३४४१८ | तंत्रवार्तिक - १३६२ । * सिखक ७ ,/पू-६




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