हिन्दी विश्वकोश | Hindi Vishvakosh

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Hindi Vishvakosh  by नगेन्द्रनाथ बसु - Nagendranath Basu

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रोधवक्र---रोपशाध्जन श्श रोघवक्का ( सं० स्त्री० ) शेधने घक्का । नदी । व निकालना और नेत्ींसे जल छेड़ना । ९ दुग्ख करना, रोधस ( सं० छ्ली० ) रुणद्वि द्वार्यादिकमिति झध (स्व घा- | पछतानां । ३ चिढ़ना, घुरा मानना । (पु०) ४ रंज, दुःख । तुम्यादसुद | उण 1१८५८) इति अखुन। नदीतीर, नदीका | ( बि० ) ५ थाड़ी-सी वात पर भी दुश्ख माननेव्राला, किनारा । रेनेवाला। ६ रोनेका सा, मुद्दरंमी । ७ वात बात पर रोधसचत्‌ ( सं० लि० ) १ उध्यकूल युक्त । ( पुर) ९ नदी । | चुरा माननेवाला, चिइचिड़ा । ( ऋक__ १1३८ ११). | रोनी धोनी ( दि'० वि० स्री० ) १ रोने थोानिवाली, शोक रोघखती ( स*५ ख्री० ) नदी । ( भागवत शुश्ड 1१८ ). * । या दुश्खकी चेप्टा वनाये रहनेवाली। ( स्त्री० ) ६ रोने सेधिन्‌ ( स'० लि०ः) १ रोधनशीछ, रोकनेवाला । (पु०) | थोनिकी बृत्ति, शोक या दुश्खको चेष्टा, मनहसी ! ' २ वृक्षमेद । «. «. | रोॉप (स'० पुर) रूप्यतेडनेनेति रुप बिमाहे, घन । १ वाण, रोधोवक्रा ( स'० स्त्री० ) रोघसा बक़ा । नदी । -.. - ... | तीर | रुददणिच - घन । २ रोपण, स्थापित करना । 5 रोधोचती ( स*० ख्री० ) रॉघोडत्यस्याः- रोधस -महुप _. | इदराव, रुकावट । ४ माहन, बुद्धि फेरना। ५ छिद्र, डीष _।. नदी । ः क सूराख। रोधोवप्र ( स'० पु० ) बेगवान नद । भ | रोप ( दि'० पु० ) दलकी एक लकड़ी ज्ञा दरिसके छेर रोध्य ( स'० लि० ) रोधवेाग्य, रे धनीय । . | पर जंघेके पार ठगी रहती है | रोधघ्र ( स'०-क्ली० ) सरुध्यतेडनेन रुघ चाहुढकात, रच। १ | रोपक ( सं० लि९ ). १ दक्षतोपणकांरी, पेड़ छगानेवाला । अपराध, कसूर । २ पाप । ३ लोघ्र, लोघ । . २. स्थापित करनेचाला, उठानेबाला । ३ स्थित केरने- रोधपुष्प ( स० पुर ) शेश्नस्थेव पुष्पतस्य | १ मधूकबूझष, | बाला । ४ सोने चांदीकी पक तौल यो मान जा खुराक महुएका पेड़ 1' ( क्ली० ) २ रोश्नफूल, लोधका फूल । ! ७०वां भाग होता है। रुपक देखा | ३ चक्रयुक्त सर्पमेद, पक प्रकारका सांप जिसके ऊपर , रोपण (स'० क्ली०) रुप-त्युर्‌ । १ जनन, जमाना, लगाना । चक्त-सा दाग हो | २ प्रादुर्माव । ३ विभाइन, मोदित करना । ४ ऊपर रखना रोघ्रपुष्पक ( स'० पु० ) १ लाघका फूल 1.२ शालिधान्य, !. या स्थापित करना,। ५ स्थापित करना,- खड़ा करना | शाछि घान । ३ सर्पजातिभेद, एक प्रकारका सांप । ६ झ'जनविशेष । ( पुर ) ७ पारदू, पारा । ८ घुसामन रोघ्रपुष्पिणी (स'० स्त्री० ) रा्र इव पुप्यतीति पुष्प णिनि- | दक्ष । £ क्षतादिपूरण, घावका सूखना या उस पर, पपड़ी डोप । धातकीबक्ष, घौका पेड़ । चंधना 1,१० घाव पर किसी प्रकारका लेप लगाना । रोन्नयुग् ( स'० झी० ) शारव और पटिका नामक दो | ( लि० ) ११ रोपक, छगानेवाला | रोपक देखे | प्रकारका लोध | के रोपणद्यूर्ण ( सं० झी० ) रोपणस्य स्यूर्ण' । नेलाज्जन- रोघशूक ( स'० पु० ) रोध्रयुष्पकार शूकशालि, लाघधके | विशेष । प्रस्तुत प्रणाठी-खपड़ेको शिला पर सच्छी फूलकें आाकारका जौ । ( वामट्सु० हू भ० , तरह पीस कर जठमें छोड़ दे । पीछे पेंदीमें जमे हुए रोध्रादिगण ( स'०.पु०) लेाध भांदि करके, गणमेद। | चूरकों फॉकफ कर जल ले ले। चघहद जछ सूख कर जव द्विचिध लेध्र, पलाश, झष्णशाद्मछी, सरऊकाछ, कट्फल; ;-...प्रपड़ीकी तरद दो जाय, तव उसे दूर कर लिफलाके कदस्व, अशोक, पढवालु, परिपेलच और मेचा पे सब | रसमें तीन वार भावना दे । अनन्तर दूशवां भाग कपूर रोभ्रादिगण हैं । इसका गुण--मेद, कफ गौर पानिदेष: |. डाछनेसे रोपणचूण प्रस्तुत होता है। इस चूर्णका नेत्र- नाशक, पूरीषादिका स्तम्भन, वर्ण्य और विषनाशक । | में अज्ञन देनेसे सभी प्रकारके नेल्रोग नए होते है” । (वाभट सुनस्था० १४ भ० ) (-मावप्र० रोगाधि० ) रोना ( हि ० क्रि० ) १ रोदन करना, .पोड़ा, दुश्ख या | रोपणका ( सं० स्री० ) पक्षिमेद, मेना । शोकसे व्याकुल हो कर सु'दसे विश्प प्रकारका खर | रोपणाज्ञन (सं० ह्ली०) १ कपाय और स्नेइसंयुक्त जन |




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