हमारे गाँवों का सुधार और संगठन | Hamare Gaon Ka Sudhar Aur Sangthan
श्रेणी : संदर्भ पुस्तक / Reference book

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
348
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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बेकारी का इछाज१. बेकारी की भयानकतानहि कक्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते हचवक्ष: कम. सर्व: प्रकृतिजेगुंण: ॥।
नन्गीता द-५एक क्षण भी कोई विना कोई कम किये नहीं रह सकता । हरेक को
प्रकृति के गुणों से वाव्य होकर कोई-न-कोई कमें करना ही पड़ता है ।
जब प्रकृति ऐसी जवदैस्त है कि कोई बिना कम किये रही नहीं सकता,
तो जिन लोगों का रोजगार छीन लिया जायगा वे अपने वेकारी के समय
में भला या बुरा क्ोई-न-कोई काम ज़रूर करेंगे । भारतवर्ष की किसानों
भौर मजदूरों की इतनी भारी आवादी में जहाँ शिक्षा के युभीते विल-
कुछ नहीं हैं, यह आशा करना व्यर्थ की कल्पना हैं कि बेकार जनता
अपने वेकारी के समय को अच्छे कामों में लगायेंगी । साधारण जन-
समुदाय अपने वचे हुए समय को संसार के किसी भाग में कहीं भी अच्छे
कामों में नहीं लगाता । यह विलकुल स्वाभाविक वात है । भारत की
जनता इसका अपवाद नहीं हो सकती । जव उसके पास कोई काम नहीं है
और वह भूखों मर रही है तव उससे कोई वात अकरनी नहीं है । इस
बेकारी का हमारे देव पर भयानक परिणाम हुआ है । संसार के अन्य
सम्य देशों में जब कभी वेकारों की गिनती हजारों और लाखों में पहुँचती
है तो उसी समय देठा-भर में उधल-पुथल मच जाती है, सरकारें वदछ
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