निर्मूल वृक्ष का फल | Nirmool Vriksha Ka Phal

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Nirmool Vriksha Ka Phal by डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल - Dr. Lakshmi Narayan Lal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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देखना श्छ है ? इतनी ही बात नहीं, यह धसख्य वर्गों में बटा है--गाव का व्यक्ति श्रौर शहर का व्यवित, गरीब व्यक्ति श्रौर घनी व्यविति, ऊचे वग का, मध्यवग का निम्न वग का व्यक्ति । फिर उच्चवग में इंतन वग, मध्यवग में इतन वग । फिर घ्रलग अलग व्यवसायी में बटा व्यक्ति--यह उद्योगपति, यह राजनीतिक, यह वुद्धिजीवी यह किसान, यह मजदूर यह दफ्तर का बाबू । मतलव हर इडिविजुम्रल एक वग है, श्रौर हर कोई इस वग सघप का “मिस्टर झभिमयु' है । हर मिस्टर श्रभिमयु एक सिस्टम में ज म लेता है, उसी म लडता है । उम इस वात का भी श्रम दिया. जाता है कि वह सिस्टम वे खिलाफ लड रहा है, वह प्रतिपक्ष में है, स्वतत्रता समानता उसका जमसिद्ध अ्रथिकार है. शरीर यह साचता हुआ वह एक दिन विसी सडक दुघटना से अस्पताल मे. या मधीन दे पुरजें की तरह चलते चलते एकाएव समाप्त हो जात! है । भारतवप में सन १६४७ के बाद मनुष्य यही इडिबिजुप्रल बताया जाने तंगा। सन १६४२ के बाद बंद राजनीतिक बनाया जान लगा प्रौर सन्‌ १६६२ के बाद बह इसान से 'वोटर' हा गया । ऐसा सांचना, निप्कप निकालना श्ौर फैसला दे दना यह भी उसी राजनीति की प्रहृति है उसी बी देन है--यह भी मैं भारत बा साधारण जन दंख रहा हू । बयोि गाव झोर 'इडिविजुम्ल को श्रत्यत महत्वपूर्ण श्ौर दूसरी शोर उसे झत्यते सुल्यहीन साबित करत रहना यही तो दुहरी चाल है उस 'महातन्र' की नही तो वह किसी दिन रककर पूद्धेगा नही थिं' ऐसा कया है ? सुवने भ्ौर प्रश्न करते वी स्थिति शोर श्रवसर ही न मिले इगमे सहायता दी विशान ने । विज्ञान उस महात्य वा बहुत बडा सहायक है । उसने तरह-तरत की सथीनें बनाई खोजे को युद्ध वे सहारव अस्थ बनाए, हर तरह से मसुप्य ध्ोर उसके समाज की बाघ रखन, प्रघिकार मे वर रखन मे सूवसूरत स सूवयूरन उपाय दिए, साथ ही मनुष्य वी इच्छामा को अपार बनाए रखने वे लिए उपनाग, श्रौर उपभोग की प्रनत दिखाए भ्ौर नित नए क्षेत्र खाते । पहल कोई दंग थाजार होता था श्रव इस विन ने हर व्यवित को वाजार बना दिया 1 अग्रेजा की ईस्ट इषिया सपनी न भारतवष को बाजार बनाया, स्वतप्रत्ता वे वाद इस देश ये हर व्यक्ति को उपभोक्ता बनाना चाहा । म्रग्रेजों से पहने सुगस राऐ, भारतीय सर फोई गवाव, वो क्तियासो पुस्प कितना चाहता था ? एक सीमा पर घ्ाकर बहू भ्रपन ही जीवन मे पूछ यठता धा--टसवें वाद कया हे कया हैं इसमें यार रे भपन प्रपन ढंग घर स्तर से सब झरने इप प्रात के उत्तर दूट सिवालत थे। पर वितान भौर राजनीठि के इस युग मे इच्छाए केवल इच्छाए हैं । इच्छाए पैदा वो जाती हैं. भ्रोर उनरी प्रनि बे जवार में व्यक्ति इतना व्यस्त




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