विश्व - परिचय | Vishv - Parichay

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Vishv - Parichay  by रवीन्द्रनाथ ठाकुर - Ravindranath Thakur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नतक पहुंचता । पिताजी कुर्सी निकाल कर आंगन में येठ जाते ।. देखते-देखते, गिर्श्ठिंगों से वेष्रित निधिड़ नोल अंधकार में जान पड़ता तारिकाये' उतर आईदें। वे मुभे नक्षत्रों की पहिचान करा देते । केवल परिचय ही नहीं, सूय॑ से उनकी कक्षा की दूरी, प्रदक्षिणा में लगने वाला समय और अन्यान्य चिवरण मु सुना जाते । वे जो कुछ कह जाते उसे याद करके उन दिनों अनभ्यस्त लेखनी से में ने एक बड़ा-सा प्रबंघ लिखा था । रस मिला था, इसीलिये लिख सका था । जीचन में यह मेरी पहली धारावाहिक रचना थी, और वह थी वैज्ञानिक संवादों के आधार पर |इसके बाद उम्च बढ़ती गई । उन दिनों तक मेरी बुद्धि इतनी खुल गई थी कि अन्दाज से अंग्र जी भाषा समभक सकूं । 'सहजबोध्य ज्योतिविज्ञान की पुस्तके' जहां-कहीं जो-कुछ मिलीं उन्हें पढ़ने में कोई कोर कसर नहीं रखो । बीच बीच में गणित- संबंधी दु्गमता के कारण माग॑ वन्घुर हो उठा था फिर भी 'उसकी कृच्छता के ऊपर से ही मन को ठेल-ठाल कर आगे बढ़ाता गया । इस से में ने यह बात सीखी है कि जीवन की प्रथम अभिन्ञता के माग में हम जो सब कुछ समभते हों सो बात नहीं है, और सब कुछ स्प्ट न समभने के कारण हम आगे न बढ़ते हों, यह वात भी नहीं कह सकते । जल-स्थल विभाग की भाँति ही हम जितना समभकते हैं उस से कहीं अधिक नहीं समभते, तौभी काम चल जाता है और हम आनन्द भी पाते




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