बारस अनुवेक्खा | Baras Anubekkha

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Baras Anubekkha by उग्रसेन जैन - Ugrasen Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रे चले आते हैं बह भी श्रपना २ फल देकर इससे जुदा होते रहते हैं । स्त्री पुत्र, भाई-वन्ध, कुटुस्ब-कबीला, घन-घान्य, हाथी-घोडे, सोटर, बायुयान, महल-मकान, वाग-वागीचे, नौकर-चाकर सब ठाठ यहां ही पड़े रह जाते हैं । जीव अकेला ही है, ऐसा विचार करना एकत्व भावना है | ४, खन्यत भावना--पंसार के चेतन और अ्रचेतन जितने भी पदाथ हैं और जिनको यह जीव सोह बश “'सेरा सेरा”” कहता है, सब ही पर हूँ--पोदगलिक चस्तुयें पराई हैं, विनाशीक हैं, त्याज्य हैं, जीव पदाथ भी एक दूपरे से मिस हैं, आपस सें एक नहीं हैं, सगे-स्नेही, स्त्री पुत्रादि थी मिन्न हैं, सन अपनी २ परणति के अजुसार प्रवर्तते हैं, इस लिये किसी से भी ममत्व नहीं करना चाहिये । इस प्रकार चिग्तबन करना ग्यत्व भावना है । ५... संसार मांवना--अनादि काल से यह जीव इस चतुगति रूप संसार मं अमण करता फिर रहा है । कभी कोई पर्याय धारण करता हैं तो कभी कोई । इस प्रकार तेली के बेल की तरह तथा रहट की घड़ी दी तरह 'घूमता रहता है । नहीं सालूम कि एक २ पर्याय को इस जीव ने पहले कितनी २ चार धारण किया है श्र भविप्य में युक्त होने तक कितनी यार घर धारण करेगा । राजा से रंक, रंक से राजा, सेसी से निरोगी निरोगी से रोगी होते नित-प्रति हग श्रपनी आंखों से रोज देखते हैं | एसी २ अनेक प्रकार की विचित्रता इस संसार में हमारे सासने होती रहती हैं । अनेक प्रकार की मानसिक चिन्ताये तथा शुररीरिक बाधाये मंसारी जीवों को सताती रहती हैं । यह संसार दुःख का सडार है, दस में इस जीव को कहीं भी सुख नहीं है । ऐसा चिन्तवन करना संसार- भावना है |




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