श्री किशनलाल जी अग्रवाल | Shri Kishanlal Ji Agrawal

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Book Image : श्री किशनलाल जी अग्रवाल  - Shri Kishanlal Ji Agrawal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( €&. ) विशेष बक़नव्य, कारोबार करें या चिकित्सा--इससे कारो- बार की ओर इनका ध्यान कम रद्द जाना स्वाभाविक ही था । इनके यहाँ वहुत से आदमी काम करते थे । इनकी गैर हाजरी में वे वेकार समय काटने लगे । कारोबार को झधिकाधिक धक्का लगता गया । यहाँ तक कि कुछ समय बाद इन्हें कई दजार रुपये का चुकसान नजर आने लगा । इन्हें बहुत चिन्ता हुई । अब उन्होंने प्राक्कतिक न्विकित्सा की बात तक न करने का निश्चय किया । ये सारा ध्यान अपने कारोबार में जगाने लगे । इस पर घाटा दिन-दिन पूरा होकर और भी लाभ हो गया । छात्र इन्होंने फिर चिकित्सा कायें की ओर ध्यान देना शुरू किया । कई रोगियों को अच्छा किया । ये सोचने लगे कि मैं जो रोग रूपी सृत्यु के मुह से निकला हूँ तो दूसरों को आरोग्य का संदेश सुनाने व्औौर रोग-मुक्त करने के लिए ही हूँ । इन्होंने प्रतिज्ञा की कि ठीक हो जाने पर कारोबार छोड़कर अपनी शेष वायु भर फेवल चिकित्सा का ही कार्य करूँगा; और अपना निजी पचीस हजार रुपये लगा कर श्रपने जन्म स्थान श्री माधोपुर में निश्शुल्क सेवा करूंगा । देश का विभाजन होने और पाकिस्तान बनने से इनकी इस योजना पर भयझ्लर आघात हुआ | इनकी सारी सम्पत्ति वहाँ दी रद्द गयी; और ये अपने परिवार के साथ जैसे-तैसे यहाँ आ सके । ऐसी दशा में प्राककतिक चिकत्सा के काम में अपनी निजी रकम लगा कर सिश्शुल्क सेवा करने की वात ही नरही । तथापि इस कार्य में इनकी रुचि और लगन वनी रहदी । व ये डाक्टर हैं, प्राकृतिक चिकित्सा करते हैं । इसका परिचय आगे सिंनेगा 1




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