सुशीला उपन्यास | Sushila Upanyas

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Sushila Upanyas  by श्री गोपालदास - Shree Gopal Das

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० सुशीला उपन्यास एक छोटी-सी पगडंडी पर ऐसे समय में एक भाग्य का मारा हुभा पथिक चल रहा है। उसके चंचल नेत्र चारों तरफ का हृश्य देख रहे हैं; परन्तु न जाने क्यों श्रांसुभों की धारा बहा रहे हैं। वह पथिक अझश्र,घारा को दस पांच कदम चलके दुपट्र से पोंछ लेता है, परन्तु धारा बन्द नहीं होती । पाठकों ! यह श्रौर कोई नहीं भ्राफत का मारा हुमा बेचारा भूपसिंह है । कई दिन का भुखा प्यास। जयदेव श्रौर सुशीला की खोज में इस जडल में भरा फंसा है । जड्जल की विस्तीणंता देखकर भुपसिंह को उससे शीघ्र पार होने की चिन्ता हुई । प्रत: वह द्र,तगति से चलने लगा । श्रौर संध्या होने के कुछ पहले एक नगर में जा पहुंचा । वहां भोजनादि की चिन्ता से निवृत्त होकर नगर के बाहर एक सुन्दर उद्यान में कुछ लोगों को झाषस में वार्ता करते देखकर उनके पास जा खड़ा हुआ श्रौर बात- चोत सुनने लगा । उनके द्वारा जो कुछ सुना उसे भूपसिह ने आँखों से भी देख लिया । भ्र्थात्‌ देखा कि एक चतुर्ध सेना बड़े वेग से इस नगर की ओर चली श्रा रही है । रथ, सैनिक, पदातियों का महास मुद्र उमड़ा झा रहा है। भगवती प्रृथिवी बिपुल धूल उड़ाकर उसका स्वागत कर रह्दी है। यह खबर विद्यद् ग सें सुवणंपुर नगर भर में फैल गई । वहां के महाराजा ने परचक्र से श्रपनो रक्षा करने के लिये श्रपने सेनापति को सचेत किया । सेनापति तत्काल ही सेना तैयार करके मुकाबला करने के लिये सुसज्जित होकर नगर के वाहर पड़ाव में श्रा डटा । इन दोनों चकों में रणचण्डी को नृत्य करती हुई देखकर घोर हिंसा के हृश्य का श्रनुमान कर श्रनुकम्पा-कम्पित सूयंदेव भ्रस्ताचल को भ्रोट में हो गये । उनके अस्त होते ही पश्चिम दिशा में संध्या की लालिमा युद्धस्थलवाहिनी रक्त नदी का नमूना दिखाने लगी । धीरे- धीरे लालिंमा विलायमान हो गई श्रौर चारों आर भझन्घकार ने झपना राज्य जमा लिया । मिथ्यात्व उपशमसम्यक्त्व के अस्त होने से इसी




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