गुप्त जी की काव्य - साधना | Gupt Ji Ki Kavya-sadhana
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
18 MB
कुल पष्ठ :
344
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१६सिमिट सी सहसा गई प्रिय की प्रिया,
एक तीक्षण झ्पाग ही उसने दिया ।
किन्तु घाते मे उसे प्रिय ने किया,
श्राप ही फिर प्राप्य श्रपना ले लिया ।'
परन्तु सभोग पर गाइस्थ्य का पावन श्रावरण शिलमिला रहा है । रीोति-
कालीन वर्णन की भऋरलक भी कही-कही हष्टिंगत होती है, जैसे--+
हुलघर बन्धु को उठाए गिरिराज सुन,
श्राई बृषभातुजा मराल की सी चाल से ।
देख सखियो के सग सुन्दर लता-सी उसे,
सुग्ध गिरिधारी हुए चचल तमाल से ।
डगता जान कम्प से करस्थ दल क्रीडा का
ब्रीडावश बन्द किए लोचन विज्ञाल से ।
पर इसमें उस युग की श्रमर्यादित उच्छूखलता नाम को भी नही है । रस
के विभिन्न भ्रवयव तो उपर्युक्त उद्धरण मे स्पष्ट है ही । बस, सिद्धराज से एक
प्रवबतरण श्रौर देख लीजिए---
पहुँची परन्तु ज्यो ही मन्दिर से सुदरी
दीखा श्राप श्र्णोराज सम्सुख श्रलिन्द मे,ललित-गभीर, गौर, गौरव का गृह-सा,
एकाकी विलोक जिसे गरिसा ने भेंटा था ।सकुचित होके कहाँ जाती राज़्नात्दिनी
बन्दी के समक्ष स्वय बन्दिनी सी हो उठी !
प्राके जड़ता ने उसे ज़कड लिया वहीं,
स्तम्भ वह भी था, श्रवलब लिया जिसका '
हो गए श्रचल एक पल को पलक भी,
कितु वहू रूप-भार कब तक झिलता ?
श्राह्म दुसरे ही क्षण दृष्टि नत हो गई ।
यहाँ काचनदे श्रौर श्रणोराज झलम्बन-श्रा्रय है । श्रणोराज का लालित्यवैनीुएतए।ल्ए'।एएल्एएल्ल्एसिशशकटटशीसएससकल१. साकेत, सरकरण सबतू २००५४, पृ० ३०
२. पच्चनप्रबन्घ; द्वितीय सरकरणु, पृ० स्प८
३ सिद्धराज; तृतीय सस्करण, प० १४०३४
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