नागार्जुन के उपन्यासों में आंचलिकता एवं व्यापकता के तरंग का मूल्यांकन | Nagarajun Ke Upanyas Men Aanchalikata Evm Vyapakata Ke Tarang Ka Mulyankan

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Nagarajun Ke Upanyas Men Aanchalikata Evm Vyapakata Ke Tarang Ka Mulyankan  by रुद्र देव - Rudra dev

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हिन्दी उपन्यास में नागार्जुन का स्थान हिन्दी में उपन्यास एक आधुनिक विधा है। यह यथार्थ मानव-अनुभवों एवं सत्य का आकलन है। यह जीवन की अनेकता में एकता तथा अपूर्णता में समग्रता स्थापित करने का प्रयत्न करता है उपन्यास में व्यावहारिक जीवन तथा तात्कालिक परिस्थितियों के चित्रण पर मुख्य रूप से बल रहता है। यह जीवन का सूक्ष्म विश्लेषण कर, उसकी समस्याओं तथा तत्सम्बन्धी समाधानों को प्रस्तुत करता है। यहाँ जीवन की अभिव्यक्ति, प्रतीकात्मक नही प्रत्यक्ष होती है और पात्रों का व्यक्तिव नही, चरित्र प्रस्तुत किया जाता है। उपन्यास मानव का अन्वेषण विश्लेषणात्मक तथा अभिनयात्मक दोनों प्रकार की शौलियों द्वारा करता है। उपन्यासकार अपने अनुभव के आधार पर मानव हदय के गूढ रहस्यों, उसके आवेगों, स्वकथनों का प्रत्यक्षीकरण करता है| कालीदास, विद्यापति, कबीर, प्रेमचंद और निराला की अगली कड़ी कवि, कथाकार, “बाबा नागार्जुन' थे। ये वास्तव में हिन्दी साहित्य के बुद्ध थे। नागार्जुन समाज और जन-जीवन के ऐसे कुशल चितेरे है, जिनके पास दीर्ध-जीवन के शताधिक अनुभव-प्रसंग है, जिनकों आधार बनाकर उन्होंने समय-समय पर कविताओं, कहानियों और उपन्यासों की रचना की है। नागार्जुन का कृती व्यक्तिव एक अक्खड़ और यथार्थवादी लेखक का रहा है। नागार्जुन का जन-जीवन से गहरा लगाव है। यह लगाव उनके उपन्यासों में मित्र, पत्नी, किसान, मजदूर, छात्र, बच्चे, पशु-पक्षी सबके साथ एक आत्मीय स्वर विकसित करता हुआ दिखाई पड़ता है। और यही कारण है कि नागार्जुन जब भी वस्तु-जगत की बातें करते है तो उसके प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता या लगाव व्यक्त होता है। विगत, दुख परम रुक कर वे बार-बार व्यापक दुःख पर प्रकाश डालते है और यही सच्चे कवि, लेखक की पहचान है, अत: धरती, जनता और श्रम के गीत गानें वाले इस युग के




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