सिपाही विद्रोह या सन सत्तावन का ग़दर | Sipahi Vidroh Ya San Sattawan Ka Gadar

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Sipahi Vidroh Ya San Sattawan Ka Gadar by स्व. पं. ईश्वरी प्रसाद शर्मा - Sw. Pt. Ishwariprasad Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आग केसे ठगी 0 ७ की # ७ कखि के अर नर री धर लात भा! िद 2 ५४ कि भा धिा निचली री प्रतापर्सिह के भाई अप्पासाहब; बाजीराव पेशबा के हाथ कद दोकर केदखाने में पड़े हुए थे । चुर्टिश गवनमेण्ट ने उन्हें कद से छुड़ाकर सितारे की गद्दी पर बिठा दिया । १८४८ इं० में ही वे भी परलोक- वासी हो गये । उनके कोई पुत्र न होने के कारण उन्होंने मरने से पहले शास्त्र की विधि के अनुसार दत्तक-पुत्र प्रहण किया । इधर गज्य से अछग किये हुए प्रतापसिंह ने भी एक छड़के को गोद लिया था ; द्रन्तु छार्ड डठहोसी ने इन दोनो ही दत्तक-पुत्रा को नाजायज ठहरा दिया। फिर कया था, राज्य लावारिस करार दे दिया गया औरर बटिद राज्य में मिछा लिया गया !.. « लार्ड डखहौसी की इस चाठ को कोर्ट-आफ-डाइरेकर्स ने भठ ही मान छिया ; परन्तु प्राचीन सन्धि के अनुसार न चठकर उन्होने जो सित्रराज्य को ही हड़प कर दिया, इसलिये अँगरेज नीतिज्ञा और धर्मज्ञों ने भी उनकी बड़ी निन्दा की । सितारा के बाद आपने भारत के केन्द्र-स्थठ बुन्देख्खण्ड के झांसी-राज्य की ओर नजर फेरी । यह राज्य पहले पेदावाओं के वीन था और बराबर मराठे ही इस राज्य के माढिक रहते आये थे । झांसी के राजा रामचन्द्रराव से अँगरेजों की स्तन थीं. और उसके अनुसार दोनों एक दूसरे के साथ भढमनसहत का बताव करने को बाध्य थे । १८२५ में जब छा कम्बरमियरने भरतपुर के मजबूत किले पर हमला किया था; उस समय नाना पण्डित नामक मध्यमारत के एक सरदार ने बड़ी भारी सेना लेकर काठपी नगर पर हमछ़ा किया था । उस संकट के समय झांसी के राजा ने ४०८८




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