गीता की कला | Geeta Ki Kala

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Geeta Ki Kala by दीनानाथ दिनेश - Deenanath Dinesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छान छदगधटयाडादयबाननछडन: गीताकान :छसटयागअजन बनऊधदनऊ गगन आश्रय ले लेता है और उससे कसी अलग नहीं होता । विद्या, कला; कुशलता और ज्ञान-विज्ञान की साधना सन लगाने वाले के लिये सरल हो जाती है । श्रीकृष्ण ने कहा-- १- सयि श्रासक्तमना:-मुझमें लगे हुए सनवाला संसार में; संसार के नश्चर पदार्थों छोर विपय सोगों सें मन लगाना नहीं पढ़ता; स्वयं लग जाता है । सार-तत्त्व में; शाश्वत सत्य में, आत्मयोग में मन लगाना पढ़ता है; क्योंकि वह प्रत्यक् नहीं है। प्रकृति दिखती है; परमेश्वर नहीं दिखता । अनार्म पदार्थ सर्वेत्र सन्मुख रदते हूं । रूप रंग रहिंत होने के कारण आत्मा सदा सम्मुख महीं रखा जा सकता । मन प्रत्यक्ष को चाहता है; विपय सोगों में सुख मानता है । परमेश्वर को जानने के लिये-उसके प्रत्यक्ीकरण या साक्षात्कार के लिये पहली शर्तें है उसमें मन लगाना --मन लगाने का सच्या साथ हे--डापनी शक्ति को परमात्मा की अनन्त शक्ति में मिलाना; अपनी ज्योति को उसकी ज्योति में मिलाकर ज्योतिमय रखना; पूर्ण रूप से नियन्त्रण करके इन्द्रियों को अन्तःकरण सहित परम तत्त्व की ओर फेर देना; शुस सें नियुक्त रदुना, सागवत भाव में विचरना । परसात्सा सें लगे हुए मनवाला ही योग का आचरण करता है श्रीकृष्ण ने परसात्म वोघ की दूसरी शर्तें रखी दे २८ योगम्‌ युज्जनुन्योग में लगा हुआ मन को आत्मा-परमात्मा और समस्त शुस कर्मों में लगासा योग का ध्येय है और लग जाना योग है । योग अनेक प्रकार का हो सकता है; पर समस्त योगों का लक्ष्य स्वमाव से परमात्मा में टिक १०:




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