गीता की कला | Geeta Ki Kala

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छान छदगधटयाडादयबाननछडन: गीताकान :छसटयागअजन बनऊधदनऊ गगनआश्रय ले लेता है और उससे कसी अलग नहीं होता । विद्या, कला; कुशलता और ज्ञान-विज्ञान की साधना सन लगाने वाले के लिये सरल हो जाती है ।श्रीकृष्ण ने कहा--१- सयि श्रासक्तमना:-मुझमें लगे हुए सनवालासंसार में; संसार के नश्चर पदार्थों छोर विपय सोगों सें मन लगाना नहीं पढ़ता; स्वयं लग जाता है । सार-तत्त्व में; शाश्वत सत्य में, आत्मयोग में मन लगाना पढ़ता है; क्योंकि वह प्रत्यक् नहीं है। प्रकृति दिखती है; परमेश्वर नहीं दिखता । अनार्म पदार्थ सर्वेत्र सन्मुख रदते हूं । रूप रंग रहिंत होने के कारण आत्मा सदा सम्मुख महीं रखा जा सकता । मन प्रत्यक्ष को चाहता है; विपय सोगों में सुख मानता है ।परमेश्वर को जानने के लिये-उसके प्रत्यक्ीकरण या साक्षात्कार के लिये पहली शर्तें है उसमें मन लगाना --मन लगाने का सच्या साथ हे--डापनी शक्ति को परमात्मा की अनन्त शक्ति में मिलाना; अपनी ज्योति को उसकी ज्योति में मिलाकर ज्योतिमय रखना; पूर्ण रूप से नियन्त्रण करके इन्द्रियों को अन्तःकरण सहित परम तत्त्व की ओर फेर देना; शुस सें नियुक्त रदुना, सागवत भाव में विचरना ।परसात्सा सें लगे हुए मनवाला ही योग का आचरण करता हैश्रीकृष्ण ने परसात्म वोघ की दूसरी शर्तें रखी दे२८ योगम्‌ युज्जनुन्योग में लगा हुआमन को आत्मा-परमात्मा और समस्त शुस कर्मों में लगासा योग का ध्येय है और लग जाना योग है । योग अनेक प्रकार का हो सकता है; पर समस्त योगों का लक्ष्य स्वमाव से परमात्मा में टिक१०:




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