कीचक - वध | Kichak Vadh

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Kichak Vadh by भवानी प्रसाद - Bhawani Prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ढ् कीचक-वघ रत्नप्रभा तनदी जी, व्यर्थ हो तुम हमारी हंसी क्यों उड़ा रही हो ? सौदामिनी ठोक तो है मदारानी जी । कहते हैं उत्तर प्रदेश को नारियाँ, सुन्दरियाँ होती हैं । मेरी माँ भी वहीं की थी । मन्दहासिनी ग्रोहो ! तभी तो तु चन्द्रकला-सी रूपमती उत्पन्न हुई है न ? सोदा मिनी तु चुप रह छिछोरी । मे, महारानीजी, श्रापसे सच कहें, उत्तर प्रदेश के सारे पुरुष रुपहीन होते हैं । श्राकषरण का तो उनमें नाम ही नहीं । दक्षिण प्रदेश को कुरूप कहकर चाहे जितनी नाक भौं सिकोड़ी जाय, पर यहाँ के पुरुषों में कंसी मोहिनी होती है ? महाराज कीचक ने जो सभी के हौसले पस्त कर दिये हैं, तो उसका कुछ श्रथ तो है ही । हाथ कंगन को श्रारसी क्या ? देख लीजिये न । महारानी द्रौपदी की दासी, यह संरन्घ्नी, कंसी तारिको के समान लिलमिल करती है ! दूसरी श्रोर वहू वत्लभ पण्डित या कंकभट्ट ! मुझों के तेजहीन मुखों की श्रोर देखा तक नहीं जाता । सरन्धो सखी सौदामिनी, बिजली यदि कभी-कभी चमके, तो श्रच्छी लगती है, परन्तु वही यदि लगातार चॉंधियाती रहे, तो उसीसे लोग भयभीत होकर मुंह फेर लेते हैं । रत्नप्रला सचमुच ननदी जी, श्रापकी यह नई दासी श्रत्यन्त रूपवती तो है हो, पर उसकी बोली भी मीठी श्रौर छू देनवाली है । यदि हस्तिनापुर की सभी नारियाँ ऐसी हो हुई, तो मत्स्यदेश्ना की स्त्रियों को चाहिए कि वे श्रपने पतियों को, उनकी श्रोर कॉँकने तक न दें ।




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