अनेकांत वर्ष 27 मई 1674 | Anekant Varsh 27 1974

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आर. एन. उपाध्ये - R. N. Upadhye

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प्रकाशचन्द्र जैन - Prakashchandra Jain

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प्रेमसागर जैन - Prem Sagar Jain

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यशपाल जैन - Yashpal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जैन मत में मति पूजा की प्राचीनता एवं विकास ३ प्रतिमा को मगध ले गया था उसे कलिंग चक्रवर्ती ऐल खारवबेल वापस कलिग ले श्राये थे” । उदयगिरि एवं खन्डगिरि (भुबनेव्वर) के श्रतिरिक्त गणेडा गुम्फा, हाथीगुम्फा, मचपुरी, श्रनतगुम्फा झादि के भ्रनुसधान से जैन मूर्तियां प्राप्त हुई है। श्रभिषेक लक्ष्मी जैनों द्वारा अपनाया गया प्रसिद्ध मोटिफ था ।. जो उदय गिरि के रानीगुम्फा तोरण पर मिलता है । भारतीय कला ता कमबद्ध इतिहास मौयंकाल से प्राप्त होता है । अनोक के पीत्र सम्प्रति ने जन धर्म को ग्रहण बार उसका प्रसार किया था । इस काल मे जैन कला के अ्रवदोष उदयगिरि गुफाओ, बिहार में पटना के श्रासपास तथा मथुरा प्रादि से प्राप्त हुए है । खारवेल द्वारा कॉलिंग जिन मुर्ति लाने का वर्णन क्या जा चुका है। कुपाणकालीन श्रतेक जैन मूरतिया प्राप्त हुई है इस काल के कलात्मक उदाहरण मथुरा के ककाॉली टीले की खुदाई प्राप्त से हुए है । उनमें तीर्थकरों की प्रतिमाये एवं झायागपट्ट प्रमुख है । भ्रयागपट्र पूजा निमित गोलाकार शिलापड़ है जिसके मध्य मे तीर्थकर प्रतिमा एव चारो आर ग्राठ जैन मत के मागलिक चिन्ह रहते है ! कुचाणकाल में प्रधानन, तीर्थकरों की. श्रतिमायें खुदी है जो कायोत्सर्ग श्रथवा समवझारण मुद्रा में है । इस काल में ऋषभनाथ, नेमिनाथ तथा महावीर की मूरतिता समव- दरण सूट्रा में तथा देप कायोंत्सगं मुद्रा में प्राप्त होती है। गुप्तकाल जिसे भारतीय ट तिहास का स्वर्णयुग कहा जाता है मे कला प्रौदता को प्राप्त हो चुकी थी गुप्तकालीन जैन प्रतिमाये सुन्दरता कलात्मक दृष्टि से उत्तम है प्रधोषस्त्र तथा श्रीवत्म ये विशेषतायें गुप्तकाल में परिलक्षित होनी है । कुमार गुप्त के एक लेख मे पाइवे नाथ मूर्ति के निर्माण का तथा स्कइगुप्त के लेख में जन पंचतीर्थी प्रतिमा की स्थापना का वर्णन है । जो किसी भद्र द्वारा निमित कराई गई थी । स्तम्भों पर उत्कीण श्राकृति ७. नर्जेल भ्राफ बिहार एन्ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी भाग २ पृ. १३। में ब्नादिनाथ, श्ञातिनाथ, पाइ्वनाथ एवं महावीर है” । चन्द्रगुप्त द्विवीय काल की एक मूत्ति बैमर पहाड़ी से प्राप्त हुई थी जिस पर चन्द्र | का का लेख म्रकित है : म्रभी कुछ पूर्व विदिशा के निकट एक ग्राम से गुप्त नरेश रामगुप्त के काल की लेख युक्त जैन तौथ॑करों चन्द्रगुप्त आदि की प्रततिमाये प्राप्त हुई है । सीरा पहाड की जेत गुफायें तथा उनमे उत्कीण मनोहर तीर्थंकर प्रतिमाग्रों का निर्माण इसी काल मे हुआ यहा से प्राप्त भगवान पा््वनाश्र की मूर्ति सप्तकणों से युक्त पदसासन में बैठ है भारतकला भवन काशी मे संग्रहीत राजघाट से प्राप्त घरमेन्द्र-पदूमसावनी सहित पार्श्वनाथ की मूर्ति कला की दृष्टि से सुन्दर है । उत्तर गुप्त काल मे जैन कला के श्रनेक केस्द्र थे अ्तएव उस काल की प्रतिमाये पर्याप्त संख्या में प्राप्त होती है । तात्रिक भावनाओं ने कला को प्रभावित किया गास्त्रीय नियमों में बद्ध होते के कारण जैन कलाकारों को स्वतत्रता नही रही । इस युग मे चौबीस तीथेकरों से सम्बन्धित चौबीस यक्षयक्षिणी की. कला में स्थात दिया गया । दक्षिण भारत में जैन मूर्तिया झनेकों स्थलों से श्राप्त हुई है । प्रसिद्ध नेवक एवं पुरातत्व श्रन्वेषक टी. एस. रामचन्द्रन के ग्रनुसार दक्षिण में जेन धर्म के प्रचार एव प्रसार का इतिहास द्रविडो को श्राय॑ सम्यता का पाठ पढ़ाने का इतिहास है इस महान ग्रभियान का प्रारम्भ ३ री सदी ई. ५ में ग्राचार्थ भद्रबाहू की दक्षिण यात्रा से हुप्आा । पैठन में सातवाहत राजाश्ो द्वारा निर्मित दूसरी सदी ई. पु. के जैन स्थापत्य उपलब्ध है । कर्नाटक में जेन कला का स्वर्णपुण का श्रारम्भ गंग वंश के राजत्वकाल में हुमा । जज ८. स्कंदगुप्त का कहांव स्तंभ लेख--का. इ. इ. ६. ३ पृ. दंश। €. आकि, रिपॉट--श्राकि, सेवें, श्राफ इंडिया १९२५-२६ पृ. १२४ | १०. जे. आओ, श्राई, वी.--मार्च ६४ पृ. २४७४-५३ । ११. जैन मा ० न्युमूमेंटस झाफ इडिया पृ. १६ ।




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