जैन - सिद्धान्त - भास्कर भाग - 3 | Jain - Siddhant - Bhaskar Bhag - 3

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारत में जन ओर बोद्ध धर्मों का तुलनात्मक पतन(लित--श्रीयुत सुपाख्वदास गुम, बीदए,)जल जी] परिकि िनाामे लेख में इस बात की विवेत्ना करने को कोशिड करू गा कि बोद्धघर्म ध्पपनो ज़्न्मभूमि भारत से क्यों बहिष्डत हुआ ओर जैनधर्म क्यों यहाँ झब तक विद्यमान है । इसके कारण दो भागों में विभक्त किये जा सकत हैं, एक श्याम्यंतरिक, दूसरे बाहा ! झाम्यन्तरिक कारगों में (१) हिन्दू, बोद्ध तथा जनम के सिद्धास्तों का पारस्परिक स्पाम्य तथा दिमेद, ओर २) ब्याचरण-सम्बन्धों गाहस्थप नियमादि सम्मिलित हैं । बाहा कार्यों में दिन्दुओ' तथा मुसलमानों का जैन तथा बोदों पर अत्याचार तथा हिन्दू घर्म की सादभोमता रकक्‍्खी जो सफती हैं । प्रथम में आम्यन्तरिक कारगों पर विचार करू गा । इसके लिये तीनों धर्मों के सिद्धान्तों का साघारण ज्ञान अत्यावश्यक है ।. हिन्दू घर्म में अनेक दर्शन हैं योर उनके सिद्धान्त भी मिन्‍न सिन्‍न हैं: फिर भी कुछ सिद्धान्त ऐसे है जिन्हें प्रायः सभी हिन्दू जनता मानती है। बे सिद्धान्त तथा जैन सोग बाजघमा के सिद्धान्त नीचे कोट में सामने सामने दिये जाते हैं ।हिन्दू ं जेन बौद्ध १ इंश्वर में विश्वास । १ ईश्वर सबज्ञ, सवंशक्ति- ' ईश्वर के अस्तित्व में प्ृ्ण । मान्‌ श्रौर बीतराग है । वीतराग | श्विश्वास | । होने के कारण न वह दृयालु है, ' | न न्यायो और न अन्य,यी । ) न वह दोनबन्यु है और न . ; शत्र, । र ईश्वर सवं्ञ, सबंब्यापी, |... २ ऐसे ईश्वर में विश्वास ।., २ आत्मा के अस्तित्व में सर्वशक्तिमानू, दूयालु, न्यायी, | दोनयंघु, तथ। इसी प्रवार के ।सनेक गुर्धों से संयुक्त है । ंपर्ग अविश्वास ।




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