विज्ञान परिषद , प्रयाग का मुख पत्र [1654 ,अक्टूबर ] | Vigyan Parishad Ka Mukh Patra[ 1654 , October]
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Add Infomation About. Dr Satyaprakash
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
95 MB
कुल पष्ठ :
427
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श्छरसायनिक क्रियाओं द्वारा निकाली जाती है। यह एक
दब्य-विशेष है जो आँखों में डाल दिया जाता है
जहां पर यह ॒पुतली को कतिपय परीक्षाओं के लिये
विस्तृत कर देता है । नरासायनिकों ने कीटारु-विनाशक पदाथ ( क70-
उ6[05 ) तैयार कर, चिकित्सकों को. बहुत सहायता
पहुँचाई है । यह आन्तरिक तथा वाह्य-दोनों ही प्रकारों
से प्रयुक्त किये जाते हैं । .पास्ट्र तथा लिस्टर के काल
सें, जिन्होंने कि अनेक विषले कीटाणुओं तथा
तज्ञसित रोगों पर बहुत खोजें की हैं, अनेक कीटाराुु-
विनाशक पदाथ तैयार हो चुके हैं । कॉरोसिव-सब्जि-
मेट ( 6ण'0अप6 80106 ) फिनॉल ( 00०00]
जिसको कि बहुधा कॉरबोलिकं. ऐडिस कहते हू ),इड्रोजन पैगक्साइड ( फिफुेश्०88, फ8/0ज्ांते6 )
तथा एल्कोहोल ( 10000! ) या सद्यसार इनमें मुख्य
हैं ।. कॉरोसिव सब्ज्मिट तथा फिनोल इतने अधिक
विषेले हैं कि वे खाये नहीं जा सकते । यद्यपि मद्यसार
का प्रयोग विंस्की तथा जिन ( छाए, ) के रूप में होता
हे तथापि वह विषला है । इन द्रव्यों में मद्यसार
निविष्ट दशा ( ००0००ाएसक900 59916 ) में उपस्थित
है। आाँयोडीन (10006 ) का प्रयोग मद्यसारिक
घोल ( क601006 801पिंणएा ) में जिसे टिन्कचर
: झॉफ. झॉयोडीन _ ( 0५6 0. 10006 )
कहते हैं होता है । आयडोफाम ( 1060१
बहिगंत-कीटारु-विनाशक (6शिएाका छाए 5600)
_ के रूप में प्रयुक्त होता है । कुछ वर्षो से मरक्यूरोक्रोम
( आ्6ा/0पत0010707006 ) तथा. बेन्जाइल रिसोरसिनोल
( 0880 लंक01 ) भी इसी काय के लिए
प्रयोग किये जाने लगे
. किन्तु चिकित्सकों को : ब्यावश्यकता थी एक ऐसे
कीटारु-बिनाशक की जो कि खाया जा सके तथा जो
शर्रीर में प्रवेश कर गुर, मुत्नाशय तथा रक्त के
कीटाणुदं को मार सके ! यह एक कठिन समस्या
थी. क्योंकि . इसके लिये अपेक्षा थी एक ऐसी वंस्तु के
झाविष्कार की जो हलकी दशा (ठं10666. 59816) में
इतनी विषली तो हो कि कीटाणुओं का विनाश करविशञान[ अक्टूबरसके किन्तु इतनी अधिक भी न हो कि जीवन ही
समाप्त कर दे। जहाँ तक मूत्राशय का सम्बन्ध हे
दैक्साइल - रिसौरसिनौल . ( ॥७इफु!#०50एएॉ०01 )
काफी उपयोगी सिद्ध हुआ है। यह पदाथ रसायनिकों
के अथक धेय का उज्ज्वल. उदाहरण है। इन्होंनेअपनी 'अविश्नांत 'खोजों के उपरांत यह जान लिया हेकिसी भूल तत्वों के समुदाय-विशेष ( 8 ०ण ) के
क्या कया शुण हैं। इन्होंने पाया कि रिसौर्सिनोल में
समस्त 'झावश्यक गुणों का अभाव है आओर सोचा कि
यह अभाव छः काबन के हैक्साइल-समुदाय ( ०४1
श0पफू 0 डा 0क्षापणा एड) को रिसोरसिनोल
में मिला देने से दूर हो जावेगा । ऐसा ही किया गया
गौर जो सम्मिश्रित. पदाथ बना . उसमें पिये जाने
वाले कोटारतु-विनाशक (एए6िएएक्री, ाएपिंड0ि0
के समस्त उपयोगी तथा झावश्यक गुण थे । अन्वगंत
छूत की बीमारियों के लिए कुछ सजीव रंग (07887070
तेफु७3 ) लैसे क्रीफ्लेबिन ( 8०.४1 ) तथा जेनी-
शियन-वायलेट ( छु6ाक्रा. 016 ) प्रयोग कियेजा रहे हैं। .नुष्य को कष्ट देने वाले रोगों में उपदंश का भी
प्रमुख स्थान हे । गणना के उपरांत पता चला है कि
संसार के पागलों का चतुथाश उपदंश क ही कारण
विक्वत-मस्तिंष्क होता है । बहुत से बच्चे या तो मरे ही
हुये पैदा होते हैं या विकलाँग होते हैं. क्योंकि उनके_ माता अथवा पिता में से किसी को उपदंश होता है ।इस रोग की उत्पत्ति का कारण एक जन्तु-जगत का
सॉप् ( फूआए8 1० ) कीटाणणु होता दे। ऐलिरिख
तथा उसके सहकारियों ने आर्सेनिक ( #705०७0० ) का
एक सम्मिश्रित पदाथ बनाया जिसको श्मार्सेनोफेमीन
( 8870]: 60प06 ) -कहते हैं । यह झार्सेनिक
( भए80एएं० ) का ६०६ वां पदाथ होने कारण
“६०६” के नाम से पुकारा जाने लगा । इस औषधि
का अविष्कार अपने लो ऋ-कल्याणकारी परिमाणों के
कारण संश्लिष्ट रसायन-शाख््र के क्ेत्र में एक उज्ज्वल
तथा उच्च स्थान का अधिकारी है । करचदडलकरिन
च्क
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