प्रवचन पाथेय भाग | Pravachan Pathey

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Pravachan Pathey  by आचार्य तुलसी - Acharya Tulsiश्रीचन्द रामपुरिया - Shrichand Rampuriya

लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :

आचार्य तुलसी - Acharya Tulsi

No Information available about आचार्य तुलसी - Acharya Tulsi

Add Infomation AboutAcharya Tulsi

श्रीचन्द रामपुरिया - Shrichand Rampuriya

No Information available about श्रीचन्द रामपुरिया - Shrichand Rampuriya

Add Infomation AboutShrichand Rampuriya

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
मर्यादा महोत्सव है इसमें १४० साधु और ३९३ साध्वियां सम्मिलित हैं । चार तीर्थ मे ठाट लग रहे हैं । यहां तक मैंने विधान के वारे मे बताया । अव साधु-साध्वियों को सम्बोधित करके इन्हे भी दो शब्द कहता है। समस्त साघु गौर साध्वियों को यही शाश्वत शिक्षा है कि तुम अपने मुल लक्ष्य को मत भुलो । तुम्हारा पहला लक्ष्य है आचार में दृढ़ रहना आचारहीन विचार क्रांति कोई काम की नहीं । मुल लक्ष्य पर वद्ध होकर चलो । जानते हो अब विदाई होनेवाली है । मेरी भी विदाई होने वाली है । मैं आपके साथ नही रहूंगा, फिर भी स्हूगा साथ मे । हर पल संयम मे जागरूक 'रहो। स्वार्थी मत बनो । जो लोग कल्याण का मार्ग चाहते है उन्हे रास्ता दिखाओ । निभंय होकर व्यक्ति-व्यक्ति मे धर्म का प्रसार करो । चाहे इसके लिये कुछ भी कुर्वान क्यो न करना पड़े । अब श्रावकों को कुछ कहना है--श्रावक-श्रादिका भी सचेष्ट और जागरूक रहे । मैं उनकी ऐसी हरकते नहीं सुनना चाहता कि वे जीवन को न उठाकर थोथी नुक्ताचीनी मे समय बिता रहे है । उन्हें आत्मालोचना में समय लगाना चाहिये । मुझे कभी-कभी ऐसा सुनने मे आता है कि तेरापन्‍्थ का संगठन अब क्या चलेगा, बहुत चला । जैसा कि समय-समय पर पहले भी सुना जाता रहा है। मैं उन्हे स्पप्ट कह देना चाहता हू कि यह भगवान महावीर का पंथ है, त्यागियों का पन्थ है । इसके प्रति यदि वे ऐसा स्वप्न देखते है तो बह स्वप्न होगा । संगठन था, है और रहेगा । इस संघ की नीव आचार पर टिकी हुई है । सभी श्रावक जीवन वदलें और जीवन को उठाने के कार्य में सहयोगी घनें । मैं एक वार फिर संघचतुष्टय से आह्वान करूंगा कि वह आरत्म-कल्याण के लिये एकनिष्ठ प्रयत्त करे । ससार अशान्त है, यह कोई नई वात नहीं है । परिस्थितियां विपम है यह भी कोई नई वात नहीं । ससार शान्ति की ओर आखे फाड़े निहार रहा है, यह भी कोई नई वात नहीं । पर शान्ति मिले कैसे ? उसे पाने का क्या रास्ता है? किस मार्ग से हम उसे पा सकते है, यह देखना है । भौतिक सुख- सुविधाओं और भोग-विलासों से शान्ति की आशा रखना तो ठीक वैसा ही है जैसा कि एक व्यक्ति गाय-भेस इसलिये न रखे कि उन्हे खिलाने-पिलाने का कष्ट कौन करे ? दूध और दही भी वह न रखे और चाहे ,कि सिफं पानी को मथ कर घी निकाल ले । भाइयों ! यह तो होने का नही । पानी से घी मिल सके तो भौतिकता मे लिप्त रहकर दुनिया भी सुख पा सकती है !




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now