श्री हनुमन्नाटक | Shri Hanumannatak

Shri Hanumannatak by नन्दकशोरदेव शर्मा - Nandakishoradev Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथमाक 3 १ दोहा। नीतोयज्ञतिद्दीसमें;, जनकदूतकंहब सयास्वयबरलतह: पगधार हपरेभाता ३६ ॥ श्राविश्वाभत्रजाकाबचन । कवित्त-रामठश्मनजूसों वोठकद्योकुलपून्यआयोहिप्र मानहैतिजनककेजाइहों । जोकहोतोराजादशरथजूपे पहुंचाउंनहीं संगचलोतुमेंकोतुकदिखाइरों ॥ छोटीसी कछोटी कटे घनहीनमोटीकर चोटीघरकद्योनेकरोंह तो चढाइहों । राजातिजनमकऋषिराजते मैं पायोगुण ऐसे शिवजीके धनुषहूतेगुणपाइदों ॥ ३० ॥ चढेजातसुख देत फूढेफूलतोरठेतऋषिसंगर्वारनकीशोभायर भांति है। किधोदिवन्रयी किधों पोरुषकीजडेनइेकिघोवीचमे रुइतउतदिनरातहे ॥ किधाराविसेंगनवनीरद्अनंगकी तरंगगंगयमुनसरस्वतीपरातहे । देखरूप गेठकीछुगाई जेदुरा राभसंगउठटाई नफिराइफिररीजातहे ॥ ३८ ॥ आयगयेजनककेदेशमेंनरेशमुत्त ऋषिकेसनेतेराजाओआ मेठेनआयोंहे। पोडशोपचारकरपूजाकुटपूज्यहूकी मन वचकरमचरणझीशंनायोहे ॥ पाछबूझीकोनकेकुमार ताततेरसंगसुंदरसपरतकेसुनतसखपायोहे । चडियेशुर्सा टघामदीजियेवडाइमोटि यहेदुचिताइधनुकाहूनचढायो है ॥ ३९ ॥ बोल्योराजषिराजागिनियेकहांठोंगुनदे




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