हिन्दी के प्रगतिवादी काव्य में प्रकृति - चित्रण का आलोचनात्मक अध्ययन | Hindi Ke Pragatiwadi Kavya Men Prakriti-chitran Ka Alochanatmak Adhyayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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+ ० मता न्तरों' में विभाजित था. ।. उसमें कुप्रथाओं ने प्रवेश कर लिया था और वह एक चिजित राष्ट्र के समाज की सरह निराश और सँक जीवन-यापन कर रहा थी. । धर्म परिरवर्तन का जी. धय उसे मुस्लिम शासनकाल में था, वह भी अब एक नवीन रूप में उसके समक्ष उपस्थित ही गया था. । राजा राममोहन राथ जैसे समाज सुधारक का आल भाव इसके पूर्व ही चुका था । वे भारतीय समाज मैं प्रचलित बाल- विवाद, सती-प्रथा जैसी कुप्रथाओ को दूर करना चाहते थे, किन्तु वे ्य कि प ड लि कु हि दा ड कम गलती कय . क का दर नव ं न्घ्ि ; इत कार्य मैं शान की सहायता आकयक सानते थे ।. चिधखिध मत- मतान्तरों के कारण देश मैं एकता का. अभाव था. ।. राजा राममोहन के उद्देश्य ब्रदुम समाज” की स्थापना की थी ।. सन्न18 35 में उनकी मृत्यु के पश्चाद् केश्लचन्द बैन ने ब्रह्म तमाज का नेतृत्व ड्राहण थिया |. उनके प्रयत्न से इस समाज का प्रधाव बंगाल की सीमा को लाघधकर उत्तर पंजाब तथा पश्चिम में महा राष्ट्री तक व्याप्त हो गधा । उन्हीं के प्रयत्न से ऊँेजी शा नु-1842 में बाल चिवाड रोकने के लिए कानून बनाया. तथा. विधवा विवाह भी कानून-सम्मत घो चित सच-1867 में महाराष्ट्र मैं प्राथना' समाज की की क कु... स्थापना दुई थी, जिसके आरा महाराष्ट्र प्रदेश में समाज सुधार का महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ ।. इस काल के सुंधुप्त भारतीय समाज को जायृतति का. सन्देश देने वाले महापुरूषी में स्वामी दयानन्द सरस्वती” , रामकृष्णे




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