प्रसाद का जीवन - दर्शन कला और कृतित्त्व | Prasad Ka Jivan - Darshan Kala Aur Kritittv

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Prasad Ka Jivan - Darshan Kala Aur Kritittv by महावीर अधिकारी - Mahavir Adhikari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पर प्रसाद का जीवन-दर्शन, कला 'दौर कृतिच्व नेपाल-भूटान के कस्तूरी बेचनेवालों तर, तथा ज्योतिपो-पंडितों से लेकर पाखंडी घर , कापालिक तक, कौन .ऐसा वर्ग वा फिर था जिसकी उस रंगमंच पर श्रवतारणा न, दोती रही दो ! इस प्रकार के विविध पार्थों की यदि ब्योरेवार तालिका बनाई जाय,तो वह कई जौ की संख्या छू लेगी । इन लोगों से सम्बन्धित कितनी ही मनोरं बक चित्र-विचित्र एवं मारे की घटनाएँ प्रसाद जी की छदय-पाटी पर श्रंकित होती जातीं । निदान, 'देखी-सुनी बहु लोक की बातें प्रसाद जी के लिए, घर बैठे जन्म-तिद्ध थीं । “इस वाल की एक घटना याद श्रा रदी दै, जो इस कारण उल्लेलनीय है कि प्रसाद जी के विश्वास-निर्माणु में उसका भी मांग है-- प्रसाद नी के जन्म से पहले उनके कई माई शैशव में ही चले गये ये । श्रतः प्रसाद जी की श्रायु-कामना के लिए, झारखंड के गोला-गोकर्णुनाय-मद्दादेव की मर्नत मान दी गईं थी कि जब बह वारद्द बरस के होगे तव उनका मु डन वहीं किया जावगा ।। इसी सम्बन्ध में उनकी नाक मो वीच से छेर दी गई थी श्र उसमें बुलाक पहना दी गईं थी; बहू घुकारे मी जाते--'कारखंडी' | यों बड़ी-बढ़ी लों श्रीर बुलाक से, देखने में, वह बालिका जान पढ़ते | कमी-कभी उनकी माता उन्हें घाँग्री भी पहना दियां कर्खी । एक दिन इसी वेश में वद घूम रहे थे श्रौर उनके यहाँ एक सामुद्रिक-बेतता श्राये हुए थे । प्रसाद जी के एक चाचा ने उन्हें थाइने के लिए कद्दा कि तनिक इस बालिका की हस्तरेखा आर लकण तो देखिए । टैवज मदाशव की विद्या यद लय न कर सकी कि वदद बालक हैं--श्रर उन्हें लड़की मानकर ही वद मविध्य-कथन कर चली | जब यह कथन पूरा हुभ्ना दो प्रताद जी के चाचा! ने उनकी घॉथरी श्रलग कर दी और तब ज्योतिपी मदाशय को श्रपनी कचाई जान पढ़ी तथा लोगों में विशेष कीतूदल हुश्ना । किन्ठ प्रसाद नी पर इस घटना का स्थायी प्रमाव पड़ा ! ज्योतिष का खोखलापन उन्हें मास गया, जो श्राजीवन बना रदा । उन्होंने सिद्धान्त वना लिया या--यदि ज्योतिष सत्य हो, तो भी मन के लिए बड़ा घातक है; दमारी वतंमान चिन्ताएँ दी कौन कम हैं जो हम मविष्य को जानकर उसके लिए, मरें-पर्चें ! एक-श्रोर तो यह सौ-रंगी दुनिया, दूसरी श्रोर घर्म का कर्मठ, घटिल, झवरद्ध-- किन्तु दार्शनिक वातावरण । यदद कुल कट्टर शैव था, जिसके एकाथ सदस्य तो ऐसे थे लो इतर देसता का नाम सुनते ही कान बन्द कर लेते | परन्दु इसी के साथ मगबान्‌ शंकर को परात्पर श्ौर देवाधिदेव मानने के कारण उन साम्प्रदायिक सिद्धान्तों के दाशंनिक तत्व का भी विचार हुश्रा करता । काशी-जैसी दियापीठ सें बसने के कारण संस्कृत की झोर मी इस छुल वी श्रमिवचि थी श्र उसमें उपयोग्य गति मी थी | कार्मीर श्ौर दक्षिण- मारत मे शैव श्रागम पर बहुत-कुछ लिया गया है श्र उत्कृष्ट वाइमय प्रस्तुत डुझ्ा है, जिसे इम सगुख श्रद्वैतवाद कदू सकते हैं । इसमें कश्मीरकों का. प्रत्यमिज्न-दशुन




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