कविता - कौमुदी भाग - 5 | Kavita Kaumudi Bhag - 5

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Kavita Kaumudi Bhag - 5  by रामनरेश त्रिपाठी - Ramnaresh Tripathi

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about रामनरेश त्रिपाठी - Ramnaresh Tripathi

Add Infomation AboutRamnaresh Tripathi

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
( ९ ) और पौत्रों को अंकृत करेगा । मैं इसे फूल की तरह ही सेभालकर रखता हूँ ।” कोई पुरुष झंख रहा है-- अये छाजानुच्चैः पथिवचनमाकण्य यृहिणी । दिदोः कण यल्लात्सुपिहितवती दीनवदना । मयि. ध्यीणोपाये यद्कृत दृद्यावश्चुशवले । तद्न्तः्दाव्य॑ में त्वमिह पुनरुद्धवुमुचितः ॥ रास्ते मे किसी ने जोर से “लावा” कहा । यृद्दिणी ने उदास मुख से बच्चे के कान यल्नपूर्वक बंद कर दिये । जिससे भूखा बच्चा छावा का नाम न सुन सके । नहीं तो वह' साँगने लगेगा । मैं निरुपाय था । यह जानकर यूह्िणी की आँखें भर आई । यही मेरे हृदय का कॉँटा है । हे भगवामू, तुम्दीं उसे निकालने में समय हो ।” किसी घर में यह दइ्य उपस्थित है-- मा. सेदीथ्विरमेहि वख्र रहितानड्टाय वालानिमा-- नायातस्तव चत्स दास्यति पिता श्रेवेयकं॑ वासखी । श्रुत्वैव॑ गृदिणी बचांखि निकटे कुल्यस्य निष्किश्वनों । निः्द्वस्याश्रुजलपुचप्छुतमुखः पान्थः पुनः प्रस्थितः ॥ 'हे बेटा ! मत रोओ । तुम्हारे पिता जब आवेंगे और तुमको चस्त्र-रहित देखेंगे तो तुमको वख्र और माला देंगे ।* गरीब पति झोपडी के पास खा था । स््री का ऐसा वचन सुनकर उसने दुख की साँस ली । आँसू से उसका सुख भीग गया और वह फिर लौट गया ।” किसी घर में यह दइ्य उपस्थित हें-- कंथाखण्डसिदं प्रयच्छ यदि वा स्वाड्के यृद्दाणा्भकं । हिक्ते भूतलमत्र नाथ भवतः पृष्ठ पलालोच्चयः । दम्पत्योरिति जल्पतोर्निदि यदा चोरः प्रविष्टस्तदा । रध कपेरमन्यतस्सदुपरि झिप्त्वा स्टन्निरगतः ॥




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now