कविता - कौमुदी भाग - 5 | Kavita Kaumudi Bhag - 5

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Book Image : कविता - कौमुदी भाग - 5  - Kavita Kaumudi Bhag - 5
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ९ ) और पौत्रों को अंकृत करेगा । मैं इसे फूल की तरह ही सेभालकर रखता हूँ ।”कोई पुरुष झंख रहा है--अये छाजानुच्चैः पथिवचनमाकण्य यृहिणी । दिदोः कण यल्लात्सुपिहितवती दीनवदना । मयि. ध्यीणोपाये यद्कृत दृद्यावश्चुशवले । तद्न्तः्दाव्य॑ में त्वमिह पुनरुद्धवुमुचितः ॥रास्ते मे किसी ने जोर से “लावा” कहा । यृद्दिणी ने उदास मुख से बच्चे के कान यल्नपूर्वक बंद कर दिये । जिससे भूखा बच्चा छावा का नाम न सुन सके । नहीं तो वह' साँगने लगेगा । मैं निरुपाय था । यह जानकर यूह्िणी की आँखें भर आई । यही मेरे हृदय का कॉँटा है । हे भगवामू, तुम्दीं उसे निकालने में समय हो ।”किसी घर में यह दइ्य उपस्थित है--मा. सेदीथ्विरमेहि वख्र रहितानड्टाय वालानिमा--नायातस्तव चत्स दास्यति पिता श्रेवेयकं॑ वासखी ।श्रुत्वैव॑ गृदिणी बचांखि निकटे कुल्यस्य निष्किश्वनों । निः्द्वस्याश्रुजलपुचप्छुतमुखः पान्थः पुनः प्रस्थितः ॥'हे बेटा ! मत रोओ । तुम्हारे पिता जब आवेंगे और तुमको चस्त्र-रहित देखेंगे तो तुमको वख्र और माला देंगे ।* गरीब पति झोपडी के पास खा था । स््री का ऐसा वचन सुनकर उसने दुख की साँस ली । आँसू से उसका सुख भीग गया और वह फिर लौट गया ।”किसी घर में यह दइ्य उपस्थित हें--कंथाखण्डसिदं प्रयच्छ यदि वा स्वाड्के यृद्दाणा्भकं ।हिक्ते भूतलमत्र नाथ भवतः पृष्ठ पलालोच्चयः ।दम्पत्योरिति जल्पतोर्निदि यदा चोरः प्रविष्टस्तदा । रध कपेरमन्यतस्सदुपरि झिप्त्वा स्टन्निरगतः ॥




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